Monday, 2 November 2026

उजाड़ के बीच भी परमेश्वर हमारे साथ हैं

 

    3 नवंबर 2026

    यशायाह 8:1-22

    1. फिर यहोवा ने मुझ से कहा, “एक बड़ी पटिया लेकर उस पर साधारण अक्षरों से यह लिख : महेर्शालाल्हाशबज के लिये।”
    2. और मैं विश्‍वासयोग्य पुरुषों को अर्थात् ऊरिय्याह याजक और जेबेरेक्याह के पुत्र जकर्याह को इस बात का साक्षी करूँगा।
    3. मैं अपनी पत्नी के पास गया, और वह गर्भवती हुई और उसके पुत्र उत्पन्न हुआ। तब यहोवा ने मुझ से कहा, “उसका नाम महेर्शालाल्हाशबज रख;
    4. क्योंकि इससे पहले कि वह लड़का बापू और माँ पुकारना जाने, दमिश्क और शोमरोन दोनों की धन–सम्पत्ति लूटकर अश्शूर का राजा अपने देश को भेजेगा।”
    5. यहोवा ने फिर मुझ से दूसरी बार कहा,
    6. “इसलिये कि लोग शीलोह के धीरे धीरे बहनेवाले सोते को निकम्मा जानते हैं, और रसीन और रमल्याह के पुत्र के संग एका करके आनन्द करते हैं,
    7. इस कारण सुन, प्रभु उन पर उस प्रबल और गहिरे महानद को, अर्थात् अश्शूर के राजा को उसके सारे प्रताप के साथ चढ़ा लाएगा; और वह उनके सब नालों को भर देगा, और सारे तटों से छलककर बहेगा;
    8. और वह यहूदा पर भी चढ़ आएगा, और बढ़ते बढ़ते उस पर चढ़ेगा और गले तक पहुँचेगा; और हे इम्मानुएल, तेरा समस्त देश उसके पंखों के फैलने से ढँप जाएगा।”
    9. हे लोगो, हल्‍ला करो तो करो, परन्तु तुम्हारा सत्यानाश हो जाएगा। हे पृथ्वी के दूर दूर देश के सब लोगो, कान लगाकर सुनो, अपनी अपनी कमर कसो तो कसो, परन्तु तुम्हारे टुकड़े टुकड़े किए जाएँगे; अपनी कमर कसो तो कसो, परन्तु तुम्हारा सत्यानाश हो जाएगा।
    10. तुम युक्‍ति करो तो करो, परन्तु वह निष्फल हो जाएगी, तुम कुछ भी कहो, परन्तु तुम्हारा कहा हुआ ठहरेगा नहीं, क्योंकि परमेश्‍वर हमारे संग है।
    11. क्योंकि यहोवा दृढ़ता के साथ मुझ से बोला और इन लोगों की सी चाल चलने को मुझे मना किया,
    12. और कहा, “जिस बात को ये लोग राजद्रोह कहें, उसको तुम राजद्रोह न कहना, और जिस बात से वे डरते हैं उससे तुम न डरना और न भय खाना।
    13. सेनाओं के यहोवा ही को पवित्र जानना; उसी का डर मानना, और उसी का भय रखना।
    14. और वह शरणस्थान होगा, परन्तु इस्राएल के दोनों घरानों के लिये ठोकर का पत्थर और ठेस की चट्टान, और यरूशलेम के निवासियों के लिये फन्दा और जाल होगा।
    15. और बहुत से लोग ठोकर खाएँगे, वे गिरेंगे और चकनाचूर होंगे; वे फन्दे में फँसेंगे और पकड़े जाएँगे।”
    16. चितौनी का पत्र बन्द कर दो, मेरे चेलों के बीच शिक्षा पर छाप लगा दो।
    17. मैं उस यहोवा की बाट जोहता रहूँगा जो अपने मुख को याकूब के घराने से छिपाये है, और मैं उसी पर आशा लगाए रहूँगा।
    18. देख, मैं और जो लड़के यहोवा ने मुझे सौंपे हैं, उसी सेनाओं के यहोवा की ओर से जो सिय्योन पर्वत पर निवास किए रहता है इस्राएलियों के लिये चिह्न और चमत्कार हैं।
    19. जब लोग तुम से कहें, “ओझाओं और टोन्हों के पास जाकर पूछो जो गुनगुनाते और फुसफुसाते हैं,” तब तुम यह कहना, “क्या प्रजा को अपने परमेश्‍वर ही के पास जाकर न पूछना चाहिये? क्या जीवतों के लिये मुर्दों से पूछना चाहिये?”
    20. व्यवस्था और चितौनी ही की चर्चा किया करो! यदि वे लोग इन वचनों के अनुसार न बोलें तो निश्‍चय उनके लिये पौ न फटेगी।
    21. वे इस देश में क्लेशित और भूखे फिरते रहेंगे; और जब वे भूखे होंगे, तब वे क्रोध में आकर अपने राजा और अपने परमेश्‍वर को शाप देंगे, और अपना मुख ऊपर आकाश की ओर उठाएँगे; 22तब वे पृथ्वी की ओर दृष्‍टि करेंगे परन्तु उन्हें सकेती और अन्धियारा अर्थात् संकट भरा अन्धकार ही देख पड़ेगा; और वे घोर अन्धकार में ढकेल दिए जाएँगे।

    महेर्शालाल्हाशबज (Maher-shalal-hash-baz) बाइबल में पाया जाने वाला सबसे लंबा शब्द और भविष्यवक्ता यशायाह के छोटे बेटे का नाम है।

    अर्थ और शाब्दिक परिचय

    • शाब्दिक अर्थ: "तेजी से लूटपाट करना, जल्दी करना, डकैती करना" या "शिकार या लूट पकड़ने में शीघ्रता"
    • इसका अर्थ था कि इससे पहले कि यह बच्चा माता-पिता कहना सीखे, दमिश्क और सामरिया की संपत्ति अश्शूर के राजा द्वारा लूट ली जाएगी।

     

    मनन — उजाड़ के बीच भी परमेश्वर हमारे साथ हैं

    यशायाह 8, अध्याय 7 के इम्मानुएल के वचन को वास्तविक जीवन की परिस्थिति में ले आता है। अध्याय 7 में परमेश्वर ने कहा था, “इम्मानुएल — परमेश्वर हमारे साथ हैं।” लेकिन अध्याय 8 में परिस्थिति तुरन्त अच्छी नहीं होती। अश्शूर का खतरा बढ़ता है, देश काँपता है और लोगों के मन में भय भर जाता है।

    फिर भी परमेश्वर का वचन वही रहता है।

    परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते।

    परमेश्वर की उपस्थिति केवल अच्छी परिस्थिति में मिलने वाला अनुभव नहीं है। युद्ध के समय भी वे साथ हैं, और युद्ध के बाद उजाड़ में भी वे साथ रहते हैं।

    परमेश्वर से अधिक किसी और शक्ति पर भरोसा करना

    पद 6 में लोग शीलोह के धीरे-धीरे बहने वाले पानी को तुच्छ समझते हैं। वह पानी बड़ा या शक्तिशाली दिखाई नहीं देता था। वह चुपचाप बहता था, लेकिन वही जीवन देने वाला जल था।

    लोगों को वह पर्याप्त नहीं लगा। वे अधिक शक्तिशाली और दिखाई देने वाली सुरक्षा चाहते थे।

    यही हमारे जीवन में भी हो सकता है।

    हम परमेश्वर की शांत उपस्थिति से अधिक धन, शक्ति, संबंध, व्यवस्था या किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर भरोसा कर सकते हैं।

    लेकिन पद 7–8 में वही बड़ी शक्ति एक उमड़ती हुई नदी की तरह आती है और सब कुछ ढँकने लगती है।

    जिस पर हम परमेश्वर से अधिक भरोसा करते हैं, वही एक दिन हमें नियंत्रित करने लग सकता है।

    धन पर अधिक भरोसा करेंगे तो धन खोने का भय हमें चलाएगा। मनुष्य पर अधिक भरोसा करेंगे तो उनकी प्रतिक्रिया हमें हिलाएगी। शक्ति पर भरोसा करेंगे तो शक्ति खोने का डर हमें बाँध देगा।

    समस्या किसी चीज़ के होने में नहीं है। समस्या यह है कि वह चीज़ परमेश्वर से अधिक हमारा सहारा बन जाए।

    उजाड़ के बीच भी परमेश्वर साथ हैं

    पद 8 में बहुत आश्चर्यजनक बात है। अश्शूर का पानी यहूदा तक पहुँचता है, फिर भी वह भूमि इम्मानुएल की भूमि कहलाती है।

    इसका अर्थ है कि संकट आने से परमेश्वर की उपस्थिति समाप्त नहीं होती।

    उजाड़ के बीच भी परमेश्वर हमारे साथ हैं।

    हम अक्सर सोचते हैं कि यदि काम अच्छा चल रहा है तो परमेश्वर हमारे साथ हैं। यदि समस्या हल हो जाए तो हम कहते हैं कि परमेश्वर ने कृपा की।

    लेकिन यदि परिस्थिति बिगड़ जाए, तो हम जल्दी सोचते हैं कि शायद परमेश्वर दूर हो गए।

    यशायाह 8 हमें दूसरा सत्य सिखाता है।

    युद्ध में भी इम्मानुएल।

    युद्ध के बाद भी इम्मानुएल।

    समृद्धि में भी इम्मानुएल।

    कमी में भी इम्मानुएल।

    परमेश्वर की उपस्थिति का अर्थ परिस्थिति का सुरक्षित रहना नहीं, बल्कि सम्बन्ध का बना रहना है।

    वही परमेश्वर किसी के लिए शरण, किसी के लिए ठोकर

    पद 13–15 में वही परमेश्वर किसी के लिए पवित्र स्थान और शरण बनते हैं, लेकिन किसी के लिए ठोकर का पत्थर और फन्दा।

    परमेश्वर नहीं बदलते।

    अन्तर हमारे हृदय के रवैये में है।

    जो परमेश्वर पर निर्भर करता है, उसके लिए उनकी उपस्थिति शरण बनती है; लेकिन जो परमेश्वर की शक्ति से अपनी इच्छा पूरी करना चाहता है, उसके लिए वही परमेश्वर ठोकर बनते हैं।

    परमेश्वर पर निर्भर व्यक्ति कहता है:

    “हे परमेश्वर, मेरी योजना पूरी कर दीजिए” से पहले,

    “हे परमेश्वर, मुझे आपकी इच्छा में ले चलिए।”

    लेकिन जो व्यक्ति परमेश्वर को अपनी इच्छा का साधन बनाना चाहता है, वह उनकी शक्ति तो चाहता है, पर उनकी इच्छा को स्वीकार नहीं करना चाहता।

    तब परमेश्वर की उपस्थिति उसे आराम नहीं देती, बल्कि उसकी अपनी इच्छा के रास्ते में बाधा जैसी लग सकती है।

    केवल परमेश्वर पर भरोसा करने का अर्थ सब कुछ सुरक्षित रहना नहीं है

    केवल परमेश्वर पर भरोसा करने का अर्थ यह नहीं है कि जीवन में कभी कुछ नहीं टूटेगा।

    कभी-कभी वही चीज़ें हट सकती हैं जिन पर हमने भरोसा किया था। हमारी झूठी सुरक्षा टूट सकती है। हमें कठिनाई और पीड़ा से गुजरना पड़ सकता है।

    फिर भी विश्वास कहता है:

    “यदि मुझसे बहुत कुछ छिन जाए, तब भी मैंने परमेश्वर को नहीं खोया।”

    परमेश्वर शरण हैं—इसका अर्थ यह नहीं कि कोई दर्द नहीं होगा।

    इसका अर्थ है कि दर्द के बीच भी हम परमेश्वर में छिप सकते हैं।

    इसलिए जो केवल परमेश्वर पर भरोसा करता है, वह यह माँग नहीं करता कि सब कुछ वैसा ही बना रहे।

    यदि सब कुछ मुझसे छिन जाए, पर परमेश्वर मेरे साथ रहें, तो मैं नष्ट नहीं हुआ हूँ।

    लोगों के भय को अपना भय मत बनाओ

    पद 11–13 में परमेश्वर यशायाह से कहते हैं कि वह लोगों के रास्ते पर न चले और जिस बात से वे डरते हैं उससे न डरे।

    भय बहुत जल्दी फैलता है।

    जब सब लोग डरते हैं, हम भी डरने लगते हैं। जब सब किसी बात को बड़ा खतरा कहते हैं, तो हम भी उसे सबसे बड़ा सत्य मान लेते हैं।

    लेकिन परमेश्वर कहते हैं:

    उनके भय को अपना मापदण्ड मत बनाओ।

    परमेश्वर केवल यह नहीं कहते कि “डरो मत।”

    वे कहते हैं:

    अपने भय का केन्द्र बदलो।

    मनुष्य से डरोगे तो मनुष्य तुम्हें चलाएगा। परिस्थिति से डरोगे तो परिस्थिति तुम्हें नियंत्रित करेगी। लेकिन परमेश्वर का भय मानोगे तो बाकी भय अपनी जगह पर आ जाएँगे।

    जब परमेश्वर सबसे बड़े दिखाई देते हैं, तब संसार के भय छोटे होने लगते हैं।

    विश्वास अपनी इच्छा पूरी होने की प्रतीक्षा नहीं करता

    पद 17 में यशायाह कहता है:

    “मैं यहोवा की बाट जोहता रहूँगा... और मैं उसी पर आशा लगाए रहूँगा।”

    परिस्थिति अभी भी कठिन है। ऐसा लगता है जैसे परमेश्वर ने अपना मुख छिपा लिया हो।

    फिर भी यशायाह प्रतीक्षा करता है।

    लेकिन वह अपनी इच्छा पूरी होने की प्रतीक्षा नहीं कर रहा।

    वह परमेश्वर की इच्छा पूरी होने की प्रतीक्षा कर रहा है।

    हम कहते हैं, “मैं परमेश्वर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ,” लेकिन कभी-कभी वास्तव में हम उस समय की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं जब हमारी इच्छा पूरी होगी।

    यशायाह की प्रतीक्षा अलग है।

    मैं परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करता; मैं परमेश्वर की प्रतीक्षा करता हूँ।

    मेरे समय पर उत्तर न मिले,

    मेरी योजना के अनुसार परिस्थिति न बदले,

    फिर भी मैं परमेश्वर के समय और उनकी इच्छा पर भरोसा करता हूँ।

    प्रतीक्षा का अर्थ अपने समय को पकड़े रहना नहीं, बल्कि अपने आप को परमेश्वर के समय में सौंपना है।

    परमेश्वर से दूर होने पर मनुष्य दूसरी आवाज़ें खोजता है

    पद 19 में लोग ओझाओं और टोन्हों के पास जाने की बात करते हैं।

    क्यों?

    क्योंकि वे उत्तर चाहते हैं।

    मनुष्य जब डरता है, तो वह भविष्य जानना चाहता है। उसे कोई निश्चित उत्तर चाहिए।

    लेकिन यदि वह परमेश्वर से नहीं पूछता, तो वह कहीं और उत्तर खोजेगा।

    इसलिए वचन पूछता है:

    “क्या प्रजा को अपने परमेश्वर ही के पास जाकर न पूछना चाहिये?”

    समस्या प्रश्न करने में नहीं है।

    समस्या यह है कि हम उत्तर किससे माँगते हैं।

    और पद 20 हमें फिर वचन की ओर लौटाता है।

    अन्धकार के समय हमारी दिशा लोगों की बातें, अफवाहें, भावनाएँ या दूसरी आत्मिक आवाज़ें नहीं हैं।

    परमेश्वर का वचन हमारा मापदण्ड है।

    परमेश्वर को छोड़ने पर चारों ओर अन्धकार दिखाई देता है

    पद 21–22 का अन्त बहुत अन्धकारमय है।

    लोग ऊपर देखते हैं,

    धरती की ओर देखते हैं,

    लेकिन उन्हें संकट और अन्धकार ही दिखाई देता है।

    क्यों?

    क्योंकि उन्होंने प्रकाश के स्रोत को छोड़ दिया है।

    जो परमेश्वर को छोड़ देता है, वह उत्तर खोजने के लिए बहुत जगह देख सकता है, पर अन्त में अन्धकार ही पाता है।

    लेकिन जो परमेश्वर की प्रतीक्षा करता है, वह अन्धकार के बीच भी जानता है कि प्रकाश का स्रोत कौन है।

    विश्वास यह नहीं कहता कि अन्धकार नहीं है।

    विश्वास कहता है कि अन्धकार के बीच भी परमेश्वर प्रकाश हैं।

    यशायाह 7 और 8 का सम्बन्ध

    यशायाह 7 में परमेश्वर ने कहा:

    “इम्मानुएल — परमेश्वर हमारे साथ हैं।”

    यशायाह 8 बताता है कि इस इम्मानुएल विश्वास को जीवन में कैसे जीना है।

    लोग जिस बात से डरते हैं, उसी से मत डरो।

    दिखाई देने वाली बड़ी शक्ति से अधिक परमेश्वर पर भरोसा करो।

    केवल परमेश्वर का भय मानो।

    उनके वचन को पकड़े रहो।

    और जब परमेश्वर दिखाई न दें, तब भी उनकी प्रतीक्षा करो।

    इम्मानुएल पर विश्वास करना केवल यह कहना नहीं है कि परमेश्वर मेरे साथ हैं; इसका अर्थ है हर परिस्थिति में परमेश्वर पर निर्भर होकर उनकी इच्छा में बने रहना।

    अन्ततः

    यशायाह 8 का सबसे बड़ा प्रश्न अश्शूर या युद्ध नहीं है।

    उजाड़ के बीच मैं किस पर भरोसा करूँगा?

    वही परमेश्वर किसी के लिए शरण बनते हैं और किसी के लिए ठोकर।

    जो परमेश्वर पर निर्भर करता है, उसके लिए परमेश्वर की उपस्थिति शान्ति और शरण है। लेकिन जो परमेश्वर को अपनी इच्छा पूरी करने का साधन बनाता है, उसके लिए परमेश्वर की इच्छा ही ठोकर बन जाती है।

    इसलिए केवल परमेश्वर पर भरोसा करने का अर्थ यह नहीं कि सब कुछ सुरक्षित रहेगा।

    यदि सब कुछ छिन भी जाए, पर परमेश्वर मेरे साथ रहें, तो मैं नष्ट नहीं हुआ हूँ।

    और विश्वास की प्रतीक्षा यह है:

    मैं अपनी इच्छा पूरी होने की प्रतीक्षा नहीं करता; मैं परमेश्वर की इच्छा पूरी होने की प्रतीक्षा करता हूँ।

    आज का मुख्य वाक्य:

    उजाड़ के बीच भी परमेश्वर हमारे साथ हैं। जो उन पर निर्भर करता है उसके लिए उनकी उपस्थिति शरण है, और जो उन्हें अपनी इच्छा का साधन बनाता है उसके लिए वही उपस्थिति ठोकर बनती है।

    और एक वाक्य और:

    सब कुछ छिन जाए, फिर भी यदि परमेश्वर मेरे साथ हैं, तो मैं नहीं टूटूँगा।

    मनन के प्रश्न

    1. क्या मैं परमेश्वर पर निर्भर हूँ, या उनकी सामर्थ्य के द्वारा अपनी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ?
    2. यदि मेरे सहारे एक-एक करके हट जाएँ, तो क्या मैं कह सकता हूँ कि परमेश्वर ही मेरे लिए पर्याप्त हैं?
    3. क्या मैं अपनी इच्छा पूरी होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, या परमेश्वर की इच्छा पूरी होने की?

    प्रार्थना

    हे परमेश्वर, उजाड़ के बीच भी आपके साथ होने को देखने दीजिए। लोगों के भय से न चलूँ, और दिखाई देने वाली शक्ति से अधिक आपको बड़ा देखूँ।

    मुझे अपनी इच्छा पूरी करने के लिए आपका उपयोग करने से बचाइए। मुझे आपकी इच्छा में प्रवेश करना सिखाइए। जब बहुत कुछ मुझसे छिन जाए और पीड़ा आए, तब भी आपको अपनी शरण मानूँ।

    मुझे परिणाम से अधिक आपकी प्रतीक्षा करना सिखाइए। आपके वचन से दूर होकर दूसरी आवाज़ों को न खोजूँ, बल्कि अन्धकार में भी आपके वचन को पकड़े रहूँ और इम्मानुएल परमेश्वर के साथ चलता रहूँ। आमीन।

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