- यहूदा का राजा आहाज जो योताम का पुत्र और उज्जिय्याह का पोता था, उसके दिनों में अराम के राजा रसीन और इस्राएल के राजा रमल्याह के पुत्र पेकह ने यरूशलेम से लड़ने के लिए चढ़ाई की, परन्तु युद्ध करके उनसे कुछ बन न पड़ा।
- जब दाऊद के घराने को यह समाचार मिला कि अरामियों ने एप्रेमियों से सन्धि की है, तब उसका और प्रजा का भी मन ऐसा काँप उठा जैसे वन के वृक्ष वायु चलने से काँप जाते हैं।
- तब यहोवा ने यशायाह से कहा, "अपने पुत्र शार्याशूब को लेकर धोबियों के खेत की सड़क से ऊपरवाले पोखरे की नाली के सिरे से आहज से भेंट करने के लिए जा,
- और उससे कह, 'सावधान और शान्त हो; और उन दोनों घूआँ निकलती लुकटियों से अर्थात् रसीन और अरामियों के भड़के हुए कोप से, और रमल्याह के पुत्र से मत डर, और न तेरा मन कच्चा हो।
- क्योंकि अरामियों और रमल्याह के पुत्र समेत एप्रैमियों ने यह कहकर तेरे विरुद्ध बुरी युक्ति ठानी है कि आओ,
- हम यहूदा पर चढ़ाई करके उसको घबरा दें, और उसको अपने वश में लाकर ताबेल के पुत्र को राजा नियुक्त कर दें।
- इसलिए प्रभु यहोवा ने यह कहा है कि यह युक्ति न तो सफल होगी और न पूरी।
- क्योंकि अराम का सिर दमिश्क, और दमिश्क का सिर रसीन है। फिर एप्रैम का सिर शोमरोन और शोमरोन का सिर रमल्याह का पुत्र है। पैंसठ वर्ष के भीतर एप्रैम का बल इतना टूट जाएगा कि व जाति बनी न रहेगी।
- यदि तुम लोग इस बात की प्रतीति न करो; तो निश्चय तुम स्थिर न रहोगे'।"
- फिर यहोवा ने आहाज से कहा,
- "अपने परमेश्वर यहोवा से कोई चिह्न माँग, चारे वह गहिरे स्थान का हो, या ऊपर आसमान का हो।"
- आहाज ने कहा, "मैं नहीं माँगने का, और मैं यहोवा की परीक्षा नहीं करूँगा।"
- तब उसने कहा, "हे दाऊद के घराने, सुनो! क्या तुम मनुष्यों को उकता देना छोटी बात समझकर अब मेरे परमेश्वर को भी उकता दोगे?
- इस कारण प्रभु आप ही तुम को एक चिह्न देगा। सुनो, एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखेगी।
- और जब तक वह बुरे को त्यागना और भले को ग्रहण करना न जाने तब तक वह मक्खन और मधु खाएगा।
- क्योंकि उसने पहले कि वह लड़का बुरे को त्यागना और भले को ग्रहण करना जाने, वह देश जिसके दोनों राजाओं से तू घबरा रहा है निर्जन हो जाएगा।
- यहोवा तुझ पर, तेरी प्रजा पर और तेरे पिता के घराने पर ऐसे दिनों को ले आएगा कि जब से एप्रैम यहूदा से अलग ह गया, तब से वैसे दिन कभी नहीं आए-अर्थात् अश्शूर के राजा के दिन।"
- उस समय यहोवा उन मक्खियों को जो मिस्र की नदियों के सिरों पर रहती हैं, और उन मधुमक्खियों को जो अश्शूर देश में रहती हैं, सीटी बजाकर बुलाएगा।
- और वे सब की सब आकर इस देश के पहाड़ी नालों में, और चट्टानों दरारों में, और सब कँटीली झाड़ियों और सब चराइयों पर बैठ जाएँगी।
- उसी समय प्रभु महानद के पारवाले अश्शूर के राजा रूपी भाड़े के उस्तरे से सिर और पाँवों के रोंएँ मूँड़ेगा, उस से दाढ़ी भी पूरी मुँड़ जाएगा।
- उस समय ऐसा होगा कि मनुष्य केवल एक कलोर और दो भेड़ों को पालेगा;
- और वे इतना दूध देंगी कि वह मक्खन खाया करेगा; क्योंकि जितने इस देश में रह जाएँगे वह सब मक्खन और मधु खाया करेंगे।
- उस समय जिन जिन स्थानों में हज़ार टुकड़े चाँदी की हज़ार दाखलताएँ हैं, उन सब स्थानों में कटीले ही कटेले पेड़ होंगे।
- तीर और धनुष लेकर लोग वहाँ जाया करेंगे, क्योंकि सारे देश में कटीले पेड़ हो जाएँगे;
- और जितने पहाड़ कुदाल से खोदे जाते हैं, उन सभों पर कटीले पेड़ों के डर के मारे कोई न जाएगा, वे गाय-बैलों के चरने के, और भेड़-बकरियों के रौंदने के लिए होंगे।
- क्या मैं परमेश्वर की सामर्थ्य चाहता हूँ, या स्वयं परमेश्वर के साथ चलना चाहता हूँ?
- मेरे डर के बीच मैं परमेश्वर से अधिक किस पर भरोसा कर रहा हूँ?
- यदि परिस्थिति न भी बदले, तो क्या मैं केवल इस सत्य पर स्थिर रह सकता हूँ कि परमेश्वर मेरे साथ हैं?
2 नवंबर 2026
यशायाह 7:1-25
मनन — परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते
आहाज के समय यहूदा एक वास्तविक संकट में था। अराम और उत्तरी इस्राएल मिलकर यरूशलेम पर चढ़ाई करना चाहते थे। यह समाचार सुनकर राजा और लोगों के मन ऐसे काँप उठे जैसे हवा में जंगल के पेड़ काँपते हैं।
लेकिन परमेश्वर ने पहले परिस्थिति को नहीं, आहाज के हृदय को सम्बोधित किया।
“सावधान और शान्त हो; मत डर, और तेरा मन कच्चा न हो।”
आहाज की दृष्टि में वे दोनों राजा बहुत बड़े खतरे थे। लेकिन परमेश्वर ने उन्हें केवल “धूआँ निकलती लुकटियाँ” कहा। इससे हमें पता चलता है कि हम जिस परिस्थिति को बहुत बड़ा देखते हैं, परमेश्वर उसे वैसा नहीं देखते।
विश्वास परिस्थिति को नकारना नहीं, बल्कि परिस्थिति को परमेश्वर की दृष्टि से देखना है।
फिर परमेश्वर ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही:
“यदि तुम विश्वास न करो, तो निश्चय स्थिर न रहोगे।”
हमारे जीवन को स्थिर करने वाली चीज़ अच्छी परिस्थिति नहीं है। समस्याओं का समाप्त हो जाना भी नहीं है।
किसी भी परिस्थिति में यदि हम यह विश्वास न करें कि परमेश्वर हमारे साथ हैं, तो हम स्थिर नहीं रह सकते।
विश्वास का अर्थ संकट-रहित जीवन नहीं, बल्कि संकट में भी इम्मानुएल परमेश्वर पर निर्भर रहना है।
परमेश्वर ने आहाज से कहा कि वह कोई चिन्ह माँगे। परमेश्वर उसके विश्वास को सहारा देना चाहते थे।
लेकिन आहाज ने कहा:
“मैं नहीं माँगूँगा, और मैं यहोवा की परीक्षा नहीं करूँगा।”
यह सुनने में बहुत धार्मिक बात लगती है। लेकिन परमेश्वर ने स्वयं उसे चिन्ह माँगने की आज्ञा दी थी।
इसलिए यहाँ उसका उत्तर विश्वास नहीं, बल्कि आज्ञा न मानना था।
धार्मिक भाषा आज्ञाकारिता की जगह नहीं ले सकती।
जैसा शमूएल की पुस्तक में कहा गया है:
आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है।
विश्वास का अर्थ केवल धार्मिक शब्द बोलना नहीं, बल्कि जब परमेश्वर बोलें तब उनके वचन पर भरोसा करके उनकी आज्ञा मानना है।
आहाज हमारे अपने जीवन का अच्छा चित्र है।
जब संकट आता है, हम परमेश्वर की सामर्थ्य चाहते हैं।
“हे परमेश्वर, मेरी समस्या हल कर दीजिए।”
“मुझे बचाइए।”
“मेरे शत्रुओं को दूर कर दीजिए।”
लेकिन कभी-कभी हम परमेश्वर की सामर्थ्य तो चाहते हैं, पर इम्मानुएल परमेश्वर को नहीं चाहते—वह परमेश्वर जो हमारे जीवन में आकर हमारे विचार, योजनाएँ और निर्णय भी अपने अधीन करना चाहते हैं।
हम परमेश्वर का हाथ चाहते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका चेहरा नहीं चाहते।
आहाज भी चाहता था कि परमेश्वर उसकी समस्या हल करें, लेकिन वह अपने जीवन का भरोसा पूरी तरह परमेश्वर पर रखने को तैयार नहीं था।
इसीलिए परमेश्वर ने सबसे बड़ा चिन्ह दिया:
“इम्मानुएल” — परमेश्वर हमारे साथ हैं।
लेकिन इम्मानुएल का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर मेरी इच्छा पूरी करेंगे।
परमेश्वर मेरे साथ हैं—इसका अर्थ यह नहीं कि वे मेरी इच्छा में प्रवेश करें; इसका अर्थ है कि मैं उनकी इच्छा में प्रवेश करूँ।
हम अक्सर प्रार्थना करते हैं:
“हे परमेश्वर, मैं जो कर रहा हूँ उसमें मेरी सहायता कीजिए।”
लेकिन गहरी प्रार्थना यह है:
“हे परमेश्वर, जो आप कर रहे हैं उसमें मुझे सहभागी कीजिए।”
इसलिए परमेश्वर की उपस्थिति केवल मेरी सफलता की गारंटी नहीं है। यह उनकी इच्छा में चलने का बुलावा है।
यशायाह 7 का बाद का भाग इम्मानुएल का अर्थ और भी गहरा करता है।
परमेश्वर साथ हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि परिस्थिति हमेशा तुरंत अच्छी हो जाएगी।
युद्ध आएगा। भूमि उजड़ सकती है। दाख की बारियाँ काँटों से भर सकती हैं। लोग पहले जैसी समृद्धि खो सकते हैं। वे ऐसी स्थिति में पहुँच सकते हैं जहाँ उन्हें मक्खन और मधु से जीवन चलाना पड़े।
फिर भी परमेश्वर उन्हें छोड़ते नहीं हैं।
परमेश्वर केवल युद्ध में हमारे साथ नहीं होते; युद्ध के बाद उजड़ी हुई भूमि में भी हमारे साथ रहते हैं।
समृद्धि में भी साथ,
कमी में भी साथ,
जीत में भी साथ,
और टूटन में भी साथ।
इसलिए इम्मानुएल का केन्द्र परिस्थिति की रक्षा नहीं, सम्बन्ध की निरन्तरता है।
परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन परमेश्वर की उपस्थिति नहीं बदलती।
हम अक्सर परमेश्वर की उपस्थिति को परिस्थिति से मापते हैं।
काम अच्छा चले तो कहते हैं कि परमेश्वर साथ हैं।
समस्या हल हो जाए तो कहते हैं कि कृपा हुई।
लेकिन यदि सब कुछ कठिन हो जाए, तो हम सोचते हैं कि शायद परमेश्वर दूर हो गए।
यशायाह 7 हमें यह सोच बदलने को कहता है।
युद्ध में भी इम्मानुएल।
युद्ध के बाद भी इम्मानुएल।
जब बहुत कुछ हो तब भी इम्मानुएल।
जब बहुत कुछ छिन जाए तब भी इम्मानुएल।
परिस्थिति बदलती है, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते।
आहाज जिन दो राजाओं से डर रहा था, वे स्थायी नहीं थे। लेकिन यदि वह परमेश्वर से अधिक किसी और शक्ति पर भरोसा करता, तो वही शक्ति बाद में उसके लिए बड़ा खतरा बन सकती थी।
हमारे जीवन में भी ऐसा हो सकता है।
यदि धन को सुरक्षा मानें, तो धन का भय हमें बाँध सकता है।
यदि मनुष्य को अन्तिम सहारा मानें, तो उनकी प्रतिक्रिया हमें नियंत्रित करेगी।
यदि शक्ति को आधार मानें, तो शक्ति खोने का डर हमें चलाएगा।
लेकिन यदि हम परमेश्वर पर निर्भर रहें, तो परिस्थिति बदलने पर भी हम खड़े रह सकते हैं।
हमारी स्थिरता परिस्थिति को नियंत्रित करने से नहीं, बल्कि अपरिवर्तनीय परमेश्वर पर निर्भर रहने से आती है।
अन्ततः
यशायाह 7 का मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि शत्रु कितने शक्तिशाली हैं।
मुख्य प्रश्न है:
आहाज किस पर भरोसा करेगा?
परमेश्वर उसे केवल अपनी शक्ति नहीं देना चाहते थे। वे अपने आपको देना चाहते थे।
“इम्मानुएल — परमेश्वर हमारे साथ हैं।”
इसलिए परमेश्वर का साथ यह नहीं कि मेरी इच्छा पूरी होगी।
इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर की इच्छा में उनके साथ चलूँगा।
और इम्मानुएल परिस्थिति का वादा नहीं, सम्बन्ध का वादा है।
किसी भी परिस्थिति में यदि हम यह विश्वास न करें कि परमेश्वर हमारे साथ हैं, तो हम स्थिर नहीं रह सकते।
आज का मुख्य वाक्य:
परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते।
मनन के प्रश्न
प्रार्थना
हे परमेश्वर, मुझे यह न सोचने दीजिए कि केवल अच्छी परिस्थिति ही आपकी उपस्थिति का प्रमाण है। हर परिस्थिति में इम्मानुएल परमेश्वर पर विश्वास करके स्थिर रहना सिखाइए।
मुझे केवल आपकी सामर्थ्य नहीं, आपको स्वयं चाहना सिखाइए। मेरी इच्छा में आपको लाने के बजाय मुझे आपकी इच्छा में प्रवेश करना सिखाइए। युद्ध में भी, टूटन में भी, समृद्धि में भी और कमी में भी आपके साथ चलने दीजिए। आमीन।
No comments:
Post a Comment