Thursday, 4 June 2026

परमेश्वर का घर वचन पर खड़ा होता है - God’s House Is Built on the Word

 5/जून/2026

1 तीमुथियुस 5:17–25

17 जो प्राचीन अच्छा प्रबन्ध करते हैं, विशेष करके वे जो वचन सुनाने और सिखाने में परिश्रम करते हैं, दो गुने आदर के योग्य समझे जाएँ।

18 क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है, “दाँवनेवाले बैल का मुँह न बाँधना,” क्योंकि “मजदूर अपनी मजदूरी का हक्‍कदार है।”

19 कोई दोष किसी प्राचीन पर लगाया जाए तो बिना दो या तीन गवाहों के उसको न सुन।

20 पाप करनेवालों को सब के सामने समझा दे, ताकि और लोग भी डरें।

21 परमेश्‍वर, और मसीह यीशु और चुने हुए स्वर्गदूतों को उपस्थित जानकर मैं तुझे चेतावनी देता हूँ कि तू मन खोलकर इन बातों को माना कर, और कोई काम पक्षपात से न कर।

22 किसी पर शीघ्र हाथ न रखना, और दूसरों के पापों में भागी न होना; अपने आप को पवित्र बनाए रख।

23 भविष्य में केवल जल ही का पीनेवाला न रह, पर अपने पेट के और अपने बार–बार बीमार होने के कारण थोड़ा–थोड़ा दाखरस भी काम में लाया कर।

24 कुछ मनुष्यों के पाप प्रगट हो जाते हैं और न्याय के लिये पहले से पहुँच जाते हैं, पर कुछ के पीछे से आते हैं।

25 वैसे ही कुछ भले काम भी प्रगट होते हैं; और जो ऐसे नहीं होते, वे भी छिप नहीं सकते।”

 

मनन —

परमेश्वर का घर वचन पर खड़ा होता है

 

1 तीमुथियुस 5:17-25 में पौलुस कहता है:

“जो प्राचीन अच्छा प्रबन्द करते हैं, विशेष करके वे जो वचन सुनाने और सिखाने में परिश्रम करते हैं, दो गिने आदर के योग्य समझे जाएँ।(17पद)

 

यहाँ पौलुस पद पर नहीं, बल्कि परिश्रम पर ज़ोर देता है।

“परिश्रम करना” के लिए यूनानी शब्द कोपियाओ (κοπιάω) प्रयोग किया गया है।

इसका अर्थ केवल काम करना नहीं है।

इसका अर्थ है:

  • थक जाने तक मेहनत करना,
  • पूरे मन और सामर्थ के साथ लगे रहना,
  • स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देना।

 

जो व्यक्ति वचन की सेवा करता है, वह अपने विचारों को नहीं सुनाता।

वह परमेश्वर के वचन को सुनता है, उस पर मनन करता है, उसके अधीन चलता है, और परमेश्वर की प्रजा को उस वचन के अनुसार जीवन जीने में सहायता करता है।

इसलिए वचन की सेवा करने वाले का परिश्रम केवल उपदेश तैयार करने का कार्य नहीं है, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को समझने और परमेश्वर की प्रजा को उस इच्छा के अनुसार चलने में सहायता करने का कार्य है।

 

पौलुस आगे कहता है:

“दाँवनेवाले बैल का मूह न न बाँधना।”

क्योंकि, “मज़दूर अपनी मज़दूरी का हक्कदार है।”(18पद)

 

वचन की सेवा करने वालों का सम्मान इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि वे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें जो वचन सौंपा गया है वह महत्वपूर्ण है।

कलीसिया मनुष्यों की क्षमता से नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन से खड़ी होती है। इसलिए जो समुदाय वचन का आदर करता है, वह वचन के लिये परिश्रम करने वालों का भी आदर करता है।

 

लेकिन वचन की सेवा करने वालों के लिये केवल सम्मान ही नहीं,

बल्कि बड़ी जिम्मेदारी भी है।

पौलुस कहता है:

“अपने आप को पवित्र बनाए रख।”(22पद)

 

जो व्यक्ति वचन सिखाता है, उसे केवल वचन का शिक्षक नहीं, बल्कि वचन के अधीन जीवन जीने वाला व्यक्ति भी होना चाहिए।

परमेश्वर वरदान से पहले चरित्र को देखते हैं, और सेवा से पहले जीवन को देखते हैं।

इसलिए जो वचन की सेवा करता है, उसे दूसरों को देखने से पहले अपने जीवन को वचन के सामने रखना चाहिए।

 

पौलुस यह भी कहता है कि किसी के प्रति पक्षपात न किया जाए।

कुछ लोगों के पाप तुरन्त प्रकट हो जाते हैं, और कुछ लोगों के पाप बाद में दिखाई देते हैं।

अच्छे कार्यों के साथ भी यही बात है।

जो आज दिखाई नहीं देता, वह भी एक दिन परमेश्वर के सामने प्रकट हो जाएगा।

मनुष्य परिणामों को देखकर निर्णय करता है, लेकिन परमेश्वर हृदय को देखते हैं।

इसलिए वचन की सेवा करने वाले को लोगों की प्रशंसा या आलोचना के अनुसार नहीं,

बल्कि परमेश्वर के सामने विश्वासयोग्यता के साथ जीवन जीना चाहिए।

 

अन्ततः 1 तीमुथियुस 5:17–25 हमें सिखाता है कि

परमेश्वर का घर वचन पर खड़ा होता है।

इसलिए परमेश्वर उन लोगों को बुलाते हैं

जो वचन और शिक्षा में परिश्रम करें।

यह परिश्रम केवल अधिक काम करने का नाम नहीं है,

बल्कि परमेश्वर के वचन को सुनने,

उसके अधीन चलने,

और परमेश्वर की प्रजा को उसकी इच्छा के अनुसार चलने में सहायता करने का नाम है।

परमेश्वर केवल परिणामों को नहीं देखते,

बल्कि उस व्यक्ति की विश्वासयोग्यता और निष्ठा को देखते हैं।

मनुष्य केवल दिखाई देने वाले फलों को देखता है,

लेकिन परमेश्वर छिपी हुई प्रार्थनाओं, आँसुओं, और आज्ञाकारिता के परिश्रम को देखते हैं।

इसलिए जो व्यक्ति वचन की सेवा करता है,

उसे मनुष्यों की स्वीकृति नहीं,

बल्कि परमेश्वर की स्वीकृति और विश्वासयोग्यता को खोजना चाहिए।

 

मनन के प्रश्न

  • क्या मैं परमेश्वर के वचन को वास्तव में मूल्यवान मानता हूँ?
  • क्या मैं लोगों की प्रशंसा और स्वीकृति से अधिक परमेश्वर के सामने विश्वासयोग्य बने रहने को महत्व देता हूँ?
  • परमेश्वर ने जो जिम्मेदारी और बुलाहट मुझे दी है, उसके लिये मैं कैसा परिश्रम कर रहा हूँ?

 

प्रार्थना

हे प्रभु,

मुझे आप के  वचन को मूल्यवान समझने की कृपा दें

जो लोग आप के वचन की सेवा में परिश्रम करते हैं,

उनका आदर करने का हृदय मुझे दें

 

मुझे केवल वचन सुनने वाला नहीं,

बल्कि वचन के अनुसार जीवन जीने वाला बना।

मेरा जीवन तेरे वचन के अधीन रहे,

और उसके द्वारा मैं दूसरों को भी खड़ा कर सकूँ।

 

मनुष्यों की प्रशंसा और सम्मान खोजने के बजाय,

मुझे आप के सामने विश्वासयोग्य सेवक बने रहने दें

 

जो सेवा और जिम्मेदारी आपने मुझे सौंपी है,

उसे आनन्द और निष्ठा के साथ पूरा करने की सामर्थ दें

 

हे प्रभु,

तू उन छिपी हुई प्रार्थनाओं, आँसुओं,

और आज्ञाकारिता के परिश्रम को देखता है।

मुझे अन्त तक विश्वासयोग्य बने रहने की कृपा दें

यीशु मसीह के नाम में प्रार्थना करता हूँ।

आमीन।


Wednesday, 3 June 2026

परमेश्वर के घर में प्रेम और जिम्मेदारी सीखना - Love and Responsibility in the Household of God

 4/जून/2026

1 तीमुथियुस 5:1–16

1 किसी बूढ़े को न डाँट, पर उसे पिता जानकर समझा दे, और जवानों को भाई जानकर;

2 बूढ़ी स्त्रियों को माता जानकर; और जवान स्त्रियों को पूरी पवित्रता से बहिन जानकर समझा दे।

3 उन विधवाओं का, जो सचमुच विधवा हैं, आदर कर।

4 यदि किसी विधवा के बच्‍चे या नाती–पोते हों, तो वे पहले अपने ही घराने के साथ भक्‍ति का बर्ताव करना, और अपने माता–पिता आदि को उनका हक्‍क देना सीखें, क्योंकि यह परमेश्‍वर को भाता है।

5 जो सचमुच विधवा है, और उसका कोई नहीं, वह परमेश्‍वर पर आशा रखती है, और रात दिन विनती और प्रार्थना में लौलीन रहती है;

6 पर जो भोगविलास में पड़ गई, वह जीते जी मर गई है।

7 इन बातों की भी आज्ञा दिया कर ताकि वे निर्दोष रहें।

8पर यदि कोई अपनों की और निज करके अपने घराने की चिन्ता न करे, तो वह विश्‍वास से मुकर गया है और अविश्‍वासी से भी बुरा बन गया है।

9 उसी विधवा का नाम लिखा जाए जो साठ वर्ष से कम की न हो, और एक ही पति की पत्नी रही हो,

10 और भले काम में सुनाम रही हो, जिस ने बच्‍चों का पालन–पोषण किया हो; अतिथियों की सेवा की हो, पवित्र लोगों के पाँव धोए हों, दुखियों की सहायता की हो, और हर एक भले काम में मन लगाया हो।

11 पर जवान विधवाओं के नाम न लिखना, क्योंकि जब वे मसीह का विरोध करके सुख–विलास में पड़ जाती हैं तो विवाह करना चाहती हैं,

12 और दोषी ठहरती हैं, क्योंकि उन्होंने अपने पहले विश्‍वास को छोड़ दिया है।

13 इसके साथ ही साथ वे घर–घर फिरकर आलसी होना सीखती हैं, और केवल आलसी नहीं पर बकबक करती रहतीं और दूसरों के काम में हाथ भी डालती हैं और अनुचित बातें बोलती हैं।

14 इसलिये मैं यह चाहता हूँ कि जवान विधवाएँ विवाह करें, और बच्‍चे जनें और घरबार संभालें, और किसी विरोधी को बदनाम करने का अवसर न दें।

15 क्योंकि कई एक तो बहककर शैतान के पीछे हो चुकी हैं।

16 यदि किसी विश्‍वासिनी के यहाँ विधवाएँ हों, तो वही उनकी सहायता करे कि कलीसिया पर भार न हो, ताकि वह उनकी सहायता कर सके जो सचमुच विधवाएँ हैं।”

 

मनन —

परमेश्वर के घर में प्रेम और जिम्मेदारी सीखना

 

1 तीमुथियुस 5:1-16 में पौलुस बुज़ुर्गों, युवाओं, विधवाओं और परिवारों के बारे में बात करता है। ऊपरी रूप से देखने पर ऐसा लगता है कि वह केवल लोगों के साथ व्यवहार करने के तरीके सिखा रहा है।

लेकिन इसके पीछे एक बड़ा प्रश्न है:

“परमेश्वर के घर में रहने वाले लोगों को कैसे जीवन जीना चाहिए?”

पौलुस कलीसिया को केवल एक संगठन के रूप में नहीं देखता।

कलीसिया जीवते परमेश्वर का घर है, और परमेश्वर का परिवार है।

इसलिए वह कहता है:

  • वृद्ध पुरुषों को पिता के समान,
  • जवान पुरुषों को भाई के समान,
  • वृद्ध स्त्रियों को माता के समान,
  • और जवान स्त्रियों को बहनों के समान समझो।

क्योंकि कलीसिया केवल एक सभा नहीं, बल्कि परमेश्वर का परिवार है।

 

इसके बाद पौलुस विधवाओं के विषय में बात करता है।

उस समय विधवाएँ समाज के सबसे असहाय लोगों में गिनी जाती थीं।

लेकिन पौलुस यह नहीं कहता कि उनकी सारी जिम्मेदारी कलीसिया उठा ले।

 

वह पहले कहता है कि बच्चे और पोते-पोतियाँ अपने माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करना सीखें। यदि कोई रिश्तेदार है, तो उसे भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

 

क्योंकि परमेश्वर ने

पहले व्यक्ति को,

फिर परिवार को,

और उसके बाद कलीसिया को जिम्मेदारी सौंपी है।

 

इसलिए कलीसिया परिवार की जिम्मेदारी को समाप्त करने वाली जगह नहीं है,

बल्कि वह समुदाय है जो उस भार को उठाने में सहायता करता है जिसे परिवार स्वयं नहीं उठा सकता।

 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रारम्भिक कलीसिया ने यह सिद्धान्त संसाधनों की सीमितता के बीच सीखा। यदि उनके पास असीमित संसाधन होते, तो शायद वे यह तक नहीं सोचते कि कौन जिम्मेदारी उठाए, और परमेश्वर की व्यवस्था क्या है।

 

लेकिन कमी ने उन्हें परमेश्वर की व्यवस्था को समझने का अवसर दिया।

इस प्रकार विधवाओं का प्रश्न केवल आर्थिक सहायता का प्रश्न नहीं था,

बल्कि यह सीखने का अवसर था कि परमेश्वर के घर में प्रेम और जिम्मेदारी कैसे प्रवाहित होनी चाहिए।

 

पौलुस कहता है:

तो वो पहलों अपने ही घराने के साथ भक्ति का बर्ताव करना, और अपने माता-पिता आदि को अपने हक्क देना सीखें, क्योंकि यह परमेश्वर को भाता है।(4पद)

यहाँ महत्वपूर्ण शब्द है:

“सीखें”।

परमेश्वर परिवार की जिम्मेदारी के माध्यम से

  • प्रेम सिखाते हैं,
  • सेवा सिखाते हैं,
  • और अपना स्वभाव सिखाते हैं।

इसलिए विश्वास का अर्थ जिम्मेदारी को दूसरों पर डाल देना नहीं,

बल्कि परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी को विश्वासयोग्यता से निभाना है।

 

 

1 तीमुथियुस 5:1–16 हमें सिखाता है कि कलीसिया जीवते परमेश्वर का घर है।

परमेश्वर का घर जिम्मेदारी से भागने की जगह नहीं, बल्कि सौंपी गई जिम्मेदारी को निभाने की जगह है।

 

परमेश्वर पहले व्यक्ति को जिम्मेदारी देते हैं, फिर परिवार को, और अन्त में कलीसिया मिलकर उस भार को उठाती है।

परमेश्वर का राज केवल हमारी सभी आवश्यकताओं को तुरन्त पूरा कर देने में ही नहीं दिखाई देता। कई बार परमेश्वर कमी और सीमितता की परिस्थितियों के द्वारा हमें अपनी व्यवस्था और जिम्मेदारी सिखाते हैं।

इसलिए परमेश्वर का जन

कठिनाइयों और कमी के समय शिकायत करने के बजाय यह पूछता है:

“प्रभु, इस परिस्थिति में आपने मुझे कौन-सी जिम्मेदारी सौंपी है?”

और उसी जिम्मेदारी को निभाने के द्वारा वह प्रेम, सेवा और परमेश्वर के स्वभाव को सीखता है।

 

मनन के प्रश्न

  • क्या मैं कलीसिया को वास्तव में परमेश्वर का परिवार मानता हूँ?
  • क्या मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दी गई जिम्मेदारियों को विश्वासयोग्यता से निभा रहा हूँ?
  • क्या मैं कमी के समय शिकायत करता हूँ, या परमेश्वर की व्यवस्था को सीखता हूँ?
  • क्या मैं अपने परिवार और कलीसिया में प्रेम और सेवा का जीवन जी रहा हूँ?

 

प्रार्थना

हे प्रभु,

मुझे कलीसिया को जीवते परमेश्वर का घर और परिवार समझने की समझ दे।

मुझे जिम्मेदारी से भागने वाला नहीं,

बल्कि तेरे द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों को विश्वासयोग्यता से निभाने वाला बना। 

कमी और कठिनाइयों के समय शिकायत करने के बजाय,

मुझे तेरी व्यवस्था और तेरी शिक्षा को समझना सिखा।

मेरे परिवार और कलीसिया में

तेरा प्रेम,

तेरी सेवा,

और तेरा स्वभाव प्रकट हो।

मुझे ऐसा जीवन दे

जो दूसरों का भार उठाने में सहभागी हो।

यीशु मसीह के नाम में प्रार्थना करता हूँ।

आमीन।