Sunday, 1 November 2026

परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते

 

    2 नवंबर 2026

    यशायाह 7:1-25

    1. यहूदा का राजा आहाज जो योताम का पुत्र और उज्जिय्याह का पोता था, उसके दिनों में अराम के राजा रसीन और इस्राएल के राजा रमल्याह के पुत्र पेकह ने यरूशलेम से लड़ने के लिए चढ़ाई की, परन्तु युद्ध करके उनसे कुछ बन न पड़ा।
    2. जब दाऊद के घराने को यह समाचार मिला कि अरामियों ने एप्रेमियों से सन्धि की है, तब उसका और प्रजा का भी मन ऐसा काँप उठा जैसे वन के वृक्ष वायु चलने से काँप जाते हैं।
    3. तब यहोवा ने यशायाह से कहा, "अपने पुत्र शार्याशूब को लेकर धोबियों के खेत की सड़क से ऊपरवाले पोखरे की नाली के सिरे से आहज से भेंट करने के लिए जा,
    4. और उससे कह, 'सावधान और शान्त हो; और उन दोनों घूआँ निकलती लुकटियों से अर्थात् रसीन और अरामियों के भड़के हुए कोप से, और रमल्याह के पुत्र से मत डर, और न तेरा मन कच्चा हो।
    5. क्योंकि अरामियों और रमल्याह के पुत्र समेत एप्रैमियों ने यह कहकर तेरे विरुद्ध बुरी युक्ति ठानी  है कि आओ,
    6. हम यहूदा पर चढ़ाई करके उसको घबरा दें, और उसको अपने वश में लाकर ताबेल के पुत्र को राजा नियुक्त कर दें।
    7. इसलिए प्रभु यहोवा ने यह कहा है कि यह युक्ति न तो सफल होगी और न पूरी।
    8. क्योंकि अराम का सिर दमिश्क, और दमिश्क का सिर रसीन है। फिर एप्रैम का सिर शोमरोन और शोमरोन का सिर रमल्याह का पुत्र है। पैंसठ वर्ष के भीतर एप्रैम का बल इतना टूट जाएगा कि व जाति बनी न रहेगी।
    9. यदि तुम लोग इस बात की प्रतीति न करो; तो निश्चय तुम स्थिर न रहोगे'।"
    10. फिर यहोवा ने आहाज से कहा,
    11. "अपने परमेश्वर यहोवा से कोई चिह्न माँग, चारे वह गहिरे स्थान का हो, या ऊपर आसमान का हो।"
    12. आहाज ने कहा, "मैं नहीं माँगने का, और मैं यहोवा की परीक्षा नहीं करूँगा।"
    13. तब उसने कहा, "हे दाऊद के घराने, सुनो! क्या तुम मनुष्यों को उकता देना छोटी बात समझकर अब मेरे परमेश्वर को भी उकता दोगे?
    14. इस कारण प्रभु आप ही तुम को एक चिह्न देगा। सुनो, एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखेगी।
    15. और जब तक वह बुरे को त्यागना और भले को ग्रहण करना न जाने तब तक वह मक्खन और मधु खाएगा।
    16. क्योंकि उसने पहले कि वह लड़का बुरे को त्यागना और भले को ग्रहण करना जाने, वह देश जिसके दोनों राजाओं से तू घबरा रहा है निर्जन हो जाएगा।
    17. यहोवा तुझ पर, तेरी प्रजा पर और तेरे पिता के घराने पर ऐसे दिनों को ले आएगा कि जब से एप्रैम यहूदा से अलग ह गया, तब से वैसे  दिन कभी नहीं आए-अर्थात् अश्शूर के राजा के दिन।"
    18. उस समय यहोवा उन मक्खियों को जो मिस्र की नदियों के सिरों पर रहती हैं, और उन मधुमक्खियों को जो अश्शूर देश में रहती हैं, सीटी बजाकर बुलाएगा।
    19. और वे सब की सब आकर इस देश के पहाड़ी नालों में, और चट्टानों  दरारों में, और सब कँटीली झाड़ियों और सब चराइयों पर बैठ जाएँगी।
    20. उसी समय प्रभु महानद के पारवाले अश्शूर के राजा रूपी भाड़े के उस्तरे से सिर और पाँवों के रोंएँ मूँड़ेगा, उस से दाढ़ी भी पूरी मुँड़ जाएगा।
    21. उस समय ऐसा होगा कि मनुष्य केवल एक कलोर और दो भेड़ों को पालेगा;
    22. और वे इतना दूध देंगी कि वह मक्खन खाया करेगा; क्योंकि जितने इस देश में रह जाएँगे वह सब मक्खन और मधु खाया करेंगे।
    23. उस समय जिन जिन स्थानों में हज़ार टुकड़े चाँदी की हज़ार दाखलताएँ हैं, उन सब स्थानों में कटीले ही कटेले पेड़ होंगे।
    24. तीर और धनुष लेकर लोग वहाँ जाया करेंगे, क्योंकि सारे देश में कटीले पेड़ हो जाएँगे;
    25. और जितने पहाड़ कुदाल से खोदे जाते हैं, उन सभों पर कटीले पेड़ों के डर के मारे कोई न जाएगा, वे गाय-बैलों के चरने के, और भेड़-बकरियों के रौंदने के लिए होंगे।

     

    मनन — परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते

    आहाज के समय यहूदा एक वास्तविक संकट में था। अराम और उत्तरी इस्राएल मिलकर यरूशलेम पर चढ़ाई करना चाहते थे। यह समाचार सुनकर राजा और लोगों के मन ऐसे काँप उठे जैसे हवा में जंगल के पेड़ काँपते हैं।

    लेकिन परमेश्वर ने पहले परिस्थिति को नहीं, आहाज के हृदय को सम्बोधित किया।

    “सावधान और शान्त हो; मत डर, और तेरा मन कच्चा न हो।”

    आहाज की दृष्टि में वे दोनों राजा बहुत बड़े खतरे थे। लेकिन परमेश्वर ने उन्हें केवल “धूआँ निकलती लुकटियाँ” कहा। इससे हमें पता चलता है कि हम जिस परिस्थिति को बहुत बड़ा देखते हैं, परमेश्वर उसे वैसा नहीं देखते।

    विश्वास परिस्थिति को नकारना नहीं, बल्कि परिस्थिति को परमेश्वर की दृष्टि से देखना है।

    फिर परमेश्वर ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही:

    “यदि तुम विश्वास न करो, तो निश्चय स्थिर न रहोगे।”

    हमारे जीवन को स्थिर करने वाली चीज़ अच्छी परिस्थिति नहीं है। समस्याओं का समाप्त हो जाना भी नहीं है।

    किसी भी परिस्थिति में यदि हम यह विश्वास न करें कि परमेश्वर हमारे साथ हैं, तो हम स्थिर नहीं रह सकते।

    विश्वास का अर्थ संकट-रहित जीवन नहीं, बल्कि संकट में भी इम्मानुएल परमेश्वर पर निर्भर रहना है।

    परमेश्वर ने आहाज से कहा कि वह कोई चिन्ह माँगे। परमेश्वर उसके विश्वास को सहारा देना चाहते थे।

    लेकिन आहाज ने कहा:

    “मैं नहीं माँगूँगा, और मैं यहोवा की परीक्षा नहीं करूँगा।”

    यह सुनने में बहुत धार्मिक बात लगती है। लेकिन परमेश्वर ने स्वयं उसे चिन्ह माँगने की आज्ञा दी थी।

    इसलिए यहाँ उसका उत्तर विश्वास नहीं, बल्कि आज्ञा न मानना था।

    धार्मिक भाषा आज्ञाकारिता की जगह नहीं ले सकती।

    जैसा शमूएल की पुस्तक में कहा गया है:

    आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है।

    विश्वास का अर्थ केवल धार्मिक शब्द बोलना नहीं, बल्कि जब परमेश्वर बोलें तब उनके वचन पर भरोसा करके उनकी आज्ञा मानना है।

    आहाज हमारे अपने जीवन का अच्छा चित्र है।

    जब संकट आता है, हम परमेश्वर की सामर्थ्य चाहते हैं।

    “हे परमेश्वर, मेरी समस्या हल कर दीजिए।”

    “मुझे बचाइए।”

    “मेरे शत्रुओं को दूर कर दीजिए।”

    लेकिन कभी-कभी हम परमेश्वर की सामर्थ्य तो चाहते हैं, पर इम्मानुएल परमेश्वर को नहीं चाहते—वह परमेश्वर जो हमारे जीवन में आकर हमारे विचार, योजनाएँ और निर्णय भी अपने अधीन करना चाहते हैं।

    हम परमेश्वर का हाथ चाहते हैं, लेकिन कभी-कभी उनका चेहरा नहीं चाहते।

    आहाज भी चाहता था कि परमेश्वर उसकी समस्या हल करें, लेकिन वह अपने जीवन का भरोसा पूरी तरह परमेश्वर पर रखने को तैयार नहीं था।

    इसीलिए परमेश्वर ने सबसे बड़ा चिन्ह दिया:

    “इम्मानुएल” — परमेश्वर हमारे साथ हैं।

    लेकिन इम्मानुएल का अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर मेरी इच्छा पूरी करेंगे।

    परमेश्वर मेरे साथ हैं—इसका अर्थ यह नहीं कि वे मेरी इच्छा में प्रवेश करें; इसका अर्थ है कि मैं उनकी इच्छा में प्रवेश करूँ।

    हम अक्सर प्रार्थना करते हैं:

    “हे परमेश्वर, मैं जो कर रहा हूँ उसमें मेरी सहायता कीजिए।”

    लेकिन गहरी प्रार्थना यह है:

    “हे परमेश्वर, जो आप कर रहे हैं उसमें मुझे सहभागी कीजिए।”

    इसलिए परमेश्वर की उपस्थिति केवल मेरी सफलता की गारंटी नहीं है। यह उनकी इच्छा में चलने का बुलावा है।

    यशायाह 7 का बाद का भाग इम्मानुएल का अर्थ और भी गहरा करता है।

    परमेश्वर साथ हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि परिस्थिति हमेशा तुरंत अच्छी हो जाएगी।

    युद्ध आएगा। भूमि उजड़ सकती है। दाख की बारियाँ काँटों से भर सकती हैं। लोग पहले जैसी समृद्धि खो सकते हैं। वे ऐसी स्थिति में पहुँच सकते हैं जहाँ उन्हें मक्खन और मधु से जीवन चलाना पड़े।

    फिर भी परमेश्वर उन्हें छोड़ते नहीं हैं।

    परमेश्वर केवल युद्ध में हमारे साथ नहीं होते; युद्ध के बाद उजड़ी हुई भूमि में भी हमारे साथ रहते हैं।

    समृद्धि में भी साथ,

    कमी में भी साथ,

    जीत में भी साथ,

    और टूटन में भी साथ।

    इसलिए इम्मानुएल का केन्द्र परिस्थिति की रक्षा नहीं, सम्बन्ध की निरन्तरता है।

    परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन परमेश्वर की उपस्थिति नहीं बदलती।

    हम अक्सर परमेश्वर की उपस्थिति को परिस्थिति से मापते हैं।

    काम अच्छा चले तो कहते हैं कि परमेश्वर साथ हैं।

    समस्या हल हो जाए तो कहते हैं कि कृपा हुई।

    लेकिन यदि सब कुछ कठिन हो जाए, तो हम सोचते हैं कि शायद परमेश्वर दूर हो गए।

    यशायाह 7 हमें यह सोच बदलने को कहता है।

    युद्ध में भी इम्मानुएल।

    युद्ध के बाद भी इम्मानुएल।

    जब बहुत कुछ हो तब भी इम्मानुएल।

    जब बहुत कुछ छिन जाए तब भी इम्मानुएल।

    परिस्थिति बदलती है, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते।

    आहाज जिन दो राजाओं से डर रहा था, वे स्थायी नहीं थे। लेकिन यदि वह परमेश्वर से अधिक किसी और शक्ति पर भरोसा करता, तो वही शक्ति बाद में उसके लिए बड़ा खतरा बन सकती थी।

    हमारे जीवन में भी ऐसा हो सकता है।

    यदि धन को सुरक्षा मानें, तो धन का भय हमें बाँध सकता है।

    यदि मनुष्य को अन्तिम सहारा मानें, तो उनकी प्रतिक्रिया हमें नियंत्रित करेगी।

    यदि शक्ति को आधार मानें, तो शक्ति खोने का डर हमें चलाएगा।

    लेकिन यदि हम परमेश्वर पर निर्भर रहें, तो परिस्थिति बदलने पर भी हम खड़े रह सकते हैं।

    हमारी स्थिरता परिस्थिति को नियंत्रित करने से नहीं, बल्कि अपरिवर्तनीय परमेश्वर पर निर्भर रहने से आती है।

    अन्ततः

    यशायाह 7 का मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि शत्रु कितने शक्तिशाली हैं।

    मुख्य प्रश्न है:

    आहाज किस पर भरोसा करेगा?

    परमेश्वर उसे केवल अपनी शक्ति नहीं देना चाहते थे। वे अपने आपको देना चाहते थे।

    “इम्मानुएल — परमेश्वर हमारे साथ हैं।”

    इसलिए परमेश्वर का साथ यह नहीं कि मेरी इच्छा पूरी होगी।

    इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर की इच्छा में उनके साथ चलूँगा।

    और इम्मानुएल परिस्थिति का वादा नहीं, सम्बन्ध का वादा है।

    किसी भी परिस्थिति में यदि हम यह विश्वास न करें कि परमेश्वर हमारे साथ हैं, तो हम स्थिर नहीं रह सकते।

    आज का मुख्य वाक्य:

    परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन इम्मानुएल नहीं बदलते।

    मनन के प्रश्न

    1. क्या मैं परमेश्वर की सामर्थ्य चाहता हूँ, या स्वयं परमेश्वर के साथ चलना चाहता हूँ?
    2. मेरे डर के बीच मैं परमेश्वर से अधिक किस पर भरोसा कर रहा हूँ?
    3. यदि परिस्थिति न भी बदले, तो क्या मैं केवल इस सत्य पर स्थिर रह सकता हूँ कि परमेश्वर मेरे साथ हैं?

    प्रार्थना

    हे परमेश्वर, मुझे यह न सोचने दीजिए कि केवल अच्छी परिस्थिति ही आपकी उपस्थिति का प्रमाण है। हर परिस्थिति में इम्मानुएल परमेश्वर पर विश्वास करके स्थिर रहना सिखाइए।

    मुझे केवल आपकी सामर्थ्य नहीं, आपको स्वयं चाहना सिखाइए। मेरी इच्छा में आपको लाने के बजाय मुझे आपकी इच्छा में प्रवेश करना सिखाइए। युद्ध में भी, टूटन में भी, समृद्धि में भी और कमी में भी आपके साथ चलने दीजिए। आमीन।

Friday, 30 October 2026

जब हम परमेश्वर के हृदय को समझते हैं, तब ठूँठ में भी आशा दिखाई देती है Hope in the Stump

 

    31 अक्टूबर 2026

    यशायाह 6:1-13

    1. जिस वर्ष उज्जिय्याह राजा मरा, मैं ने प्रभु को बहुत ही ऊँचे सिंहासन पर विराजमान देखा; और उसके वस्त्र के घेर से मन्दिर भर गया।
    2. उससे ऊँचे पर साराप दिखाई दिए; उनके छः छः पंख थे; दो पंखों से वे अपने मुँह को ढाँपे थे और दो से अपने पाँवों को, और दो से उड़ रहे थे।
    3. वे एक दूसरे से पुकार पुकारकर कह रहे थे: "सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है; सारी पृथ्वी उसके तेज से भरपूर है।"
    4. और पुकारनेवाले के शब्द से डेवढ़ियों की नींवें डोल उठीं, और भवन धूएँ से भर गया।
    5. तब मैं ने कहा, "हाय! हाय! मैं नष्ट हुआ; क्योंकि मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूँ; और अशुद्ध होंठवाले मनुष्यों के बीच में रहता हूँ, क्योंकि मैं ने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आँखों से देखा है!"
    6. तब एक साराप हाथ में अँगारा लिए हुए, जिसे उसने चिमटे से वेदी परसे उठा लिया था, मेरे पास उड़ कर आया।
    7. उसने उससे मेरे मुँह को छूकर कहा, "देख, इसने तेरे होंठों को छू लिया है, इसलिए तेरा अधर्म दूर हो गया और तेरे पाप क्षमा हो गए।"
    8. तब मैं ने प्रभु का यह वचन सुना, "मैं किसको भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा?" तब मैं ने कहा, "मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज।"
    9. उसने कहा, "जा, और इन लोगों से कह, 'सुनते ही रहो, परन्तु न समझों, देखते ही रहो, परन्तु न बूझो।'
    10. तू इन लोगों के मन को मोटा और उनके कानों को भारी कर, और उनकी आँखों को बन्द कर, ऐसा न हो कि वे आँखों से देखे, और कानों से सुनें, और मन से बूझें, और मन फिराएँ और चंगे हो जाएँ।"
    11. तब मैं ने पूछा, "हे प्रभु कब तक?" उसने कहा, "जब तक नगर न उजड़े और उनमें कोई रह न जाए, और घरों में कोई मनुष्य न रह जाए, और देश उजाड़ और सुनसान हो जाए,
    12. और यहोवा मनुष्यों को उस में से दूर कर दे, और देश के बहुत से स्थान निर्जन हो जाएँ।
    13. चाहे उसके निवासियों का दसवाँ अंश भी रह जाए, तौभी वह नष्ट किया जाएगा, परन्तु जैसे छोटे या बड़े बांजवृक्ष को काट डाले पर भी उसका ठूँठ बना रहता है, वैसे ही पवित्र वंश उसका ठूँठ रहेगा।"

     

    मनन — जब हम परमेश्वर के हृदय को समझते हैं, तब ठूँठ में भी आशा दिखाई देती है

    जिस वर्ष उज्जिय्याह राजा मरा, उस समय यशायाह ने संसार के राजा और बदलती हुई परिस्थितियों को नहीं, बल्कि ऊँचे और महान सिंहासन पर विराजमान परमेश्वर को देखा।

    पृथ्वी का राजा मर गया था, लेकिन परमेश्वर का सिंहासन खाली नहीं था।

    जब परिस्थितियाँ हिलती हैं, तब हमें परिस्थिति से पहले परमेश्वर को देखना चाहिए।

    जब यशायाह ने परमेश्वर को सही रीति से देखा, तब उसने अपने आप को भी सही रीति से देखा।

    उसने कहा:

    “हाय! मैं नष्ट हुआ।”

    पवित्र परमेश्वर के सामने उसे अपनी अशुद्धता और अपनी सीमा दिखाई दी। उसने समझ लिया कि वह अपने बल पर परमेश्वर के सामने खड़ा नहीं हो सकता।

    लेकिन ठीक उसी स्थान पर परमेश्वर की कृपा प्रकट हुई।

    यशायाह ने अपने आप को शुद्ध नहीं किया। वेदी से लिया गया अँगारा उसके होंठों को छूता है, और परमेश्वर उसके अधर्म को दूर करके उसके पाप को क्षमा करते हैं।

    जब हम परमेश्वर को सही रीति से देखते हैं, तब हम अपने आप को देखते हैं; और जब हम समझते हैं कि हम अपने बल पर उनके सामने खड़े नहीं हो सकते, तब परमेश्वर की कृपा हमें शुद्ध करती है।

    लेकिन इस शुद्धि का उद्देश्य केवल यशायाह को अधिक अच्छा या पूर्ण मनुष्य बनाना नहीं था।

    परमेश्वर ने उसे शुद्ध करके अपने साथ संगति के स्थान में बुलाया।

    शुद्धि का उद्देश्य पूर्णता नहीं, परमेश्वर के साथ संगति है।

    लेकिन सच्ची संगति केवल परमेश्वर के निकट रहने से पूरी नहीं होती।

    सच्ची संगति में हम सामने वाले के हृदय को जानने लगते हैं। हम समझने लगते हैं कि वह किस बात से आनन्दित होता है, किस बात से दुखी होता है, और उसका मन कहाँ लगा हुआ है।

    इसीलिए परमेश्वर कहते हैं:

    “मैं किसको भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा?”

    तब यशायाह उत्तर देता है:

    “मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज।”

    यह ऐसा नहीं है कि संगति समाप्त हुई और अब सारा ध्यान सेवा पर आ गया।

    सच्ची सेवा परमेश्वर के साथ संगति का अगला चरण है, जहाँ हम उनके हृदय और उनके कार्य में सहभागी होते हैं।

    इसलिए सेवा का अर्थ अकेले परमेश्वर के लिए कुछ कर दिखाना नहीं है।

    सेवा का अर्थ है जहाँ परमेश्वर देखते हैं वहाँ देखना, जिनसे परमेश्वर प्रेम करते हैं उनसे प्रेम करना, और जो काम परमेश्वर कर रहे हैं उसमें उनके साथ चलना।

    लेकिन यशायाह को जो काम मिला वह आसान नहीं था।

    परमेश्वर ने उसे ऐसे लोगों के पास भेजा जो सुनते हुए भी नहीं समझेंगे और देखते हुए भी नहीं बूझेंगे।

    हम स्वाभाविक रूप से सोच सकते हैं:

    यदि परमेश्वर ने यशायाह को चुना, तो क्या उसकी घोषणा से लोग लौट नहीं आने चाहिए थे? क्या लोगों को परमेश्वर का वचन समझ में नहीं आना चाहिए था?

    लेकिन परमेश्वर ने पहले ही लोगों की कठोरता और आने वाले न्याय के बारे में बता दिया।

    यहीं से सेवा का असली अर्थ सामने आता है।

    सेवा किसी फल या परिणाम को उत्पन्न करने से पहले, मुझे भेजने वाले परमेश्वर के हृदय को समझने से शुरू होती है।

    यदि हम केवल लोगों की प्रतिक्रिया देखें, तो सेवा को सफलता और असफलता में बाँट देंगे।

    लोग लौट आएँ तो सफलता।

    लोग न लौटें तो असफलता।

    लेकिन परमेश्वर के हृदय को समझने पर मापदण्ड बदल जाता है।

    परमेश्वर जानते थे कि लोग कठोर हैं, फिर भी वे बोलते रहे।

    लोग बार-बार अस्वीकार करते रहे, फिर भी परमेश्वर चुप नहीं हुए।

    न्याय निकट था, फिर भी परमेश्वर ने अपना वचन भेजा।

    इसलिए यशायाह की सेवा केवल संदेश पहुँचाना नहीं थी।

    वह अन्त तक बोलते रहने वाले परमेश्वर के हृदय में सहभागी होना था।

    इसी स्थान पर यशायाह पूछता है:

    “हे प्रभु, कब तक?”

    यह केवल इतना नहीं है कि:

    “मुझे यह कठिन काम कब तक करना है?”

    इस प्रश्न में परमेश्वर के हृदय को और गहराई से जानने की इच्छा भी दिखाई देती है।

    “हे परमेश्वर, इन लोगों के लिए आपका हृदय कहाँ तक जाता है?”

    “न्याय के बीच भी आप क्या पूरा करना चाहते हैं?”

    सच्चा सेवक केवल परमेश्वर की आज्ञा सुनने वाला नहीं होता।

    सच्चा सेवक परमेश्वर के हृदय को पूछने वाला होता है।

    परमेश्वर के हृदय को समझे बिना सच्ची सहभागिता सम्भव नहीं है।

    और परमेश्वर उस प्रश्न के अन्त में यशायाह को ठूँठ दिखाते हैं।

    नगर उजड़ेंगे।

    लोग बिखरेंगे।

    वृक्ष काटा जाएगा।

    लेकिन ठूँठ रह जाएगा।

    “पवित्र वंश उसका ठूँठ रहेगा।”

    अब यशायाह की आँखों को केवल उजाड़ दिखाई नहीं देता।

    जब वह परमेश्वर के हृदय को समझता है, तब न्याय के बीच भी उसे वह दिखाई देता है जिसे परमेश्वर ने बचाकर रखा है।

    ठूँठ आशा है।

    लेकिन यह केवल ऐसी आशा नहीं है कि “एक दिन परिस्थिति फिर अच्छी हो जाएगी।”

    ठूँठ इस बात की आशा है कि परमेश्वर का कार्य समाप्त नहीं हुआ है।

    मनुष्य असफल हो सकता है।

    राष्ट्र गिर सकता है।

    दिखाई देने वाला काम रुक सकता है।

    लेकिन परमेश्वर का कार्य समाप्त नहीं होता।

    वे बचे हुओं को रखते हैं, फिर से आरम्भ करते हैं, और अपनी इच्छा को पूरा करते रहते हैं।

    इसलिए सच्चा सेवक केवल उजड़ी हुई परिस्थिति नहीं देखता।

    वह परमेश्वर के हृदय को जानता है, इसलिए टूटन के बीच भी परमेश्वर द्वारा छोड़े गए ठूँठ को देखता है।

    यशायाह 6 का प्रवाह इस प्रकार देखा जा सकता है:

    परमेश्वर को देखना → अपने आप को देखना → कृपा से शुद्ध होना → परमेश्वर के साथ संगति → परमेश्वर के हृदय को पूछना → उनके हृदय को समझना → उनके हृदय में सहभागी होना → ठूँठ की आशा देखना → सेवा

    अन्ततः

    यशायाह की सेवा केवल “मुझे भेज” कहने के उत्साह से पूरी नहीं हुई।

    उसने परमेश्वर को देखा, अपने आप को देखा, कृपा से शुद्ध हुआ, और परमेश्वर के साथ संगति में उनके हृदय को पूछना और समझना सीखा।

    तब वह लोगों की प्रतिक्रिया और दिखाई देने वाले परिणाम से आगे परमेश्वर के कार्य को देख सका।

    सेवा परिणाम पैदा करने से शुरू नहीं होती; वह मुझे भेजने वाले परमेश्वर के हृदय को समझने से शुरू होती है।

    और:

    ठूँठ आशा है। जब सब कुछ समाप्त होता हुआ दिखाई दे, तब भी परमेश्वर का कार्य समाप्त नहीं होता।

    इसलिए आज का मुख्य वाक्य है:

    जो परमेश्वर के हृदय को समझता है, वह टूटे हुए वर्तमान से आगे देखता है और उसी टूटन के बीच परमेश्वर द्वारा छोड़ी गई आशा के ठूँठ को पहचानता है।

    मनन के प्रश्न

    1. क्या मैं हिलती हुई परिस्थितियों से पहले सिंहासन पर विराजमान परमेश्वर को देख रहा हूँ?
    2. क्या मैं सेवा के परिणाम से पहले मुझे भेजने वाले परमेश्वर के हृदय को समझना चाहता हूँ?
    3. जो परिस्थिति अभी समाप्त जैसी दिखाई देती है, उसमें परमेश्वर ने कौन-सा “ठूँठ” छोड़ रखा है?

    प्रार्थना

    हे परमेश्वर, परिस्थिति से पहले आपको देखने दीजिए और आपकी पवित्रता के सामने अपने आप को सही रीति से पहचानने दीजिए। अपनी कृपा से मुझे शुद्ध कीजिए और अपने साथ गहरी संगति में रखिए।

    मुझे परिणामों में उलझने से बचाइए। मुझे भेजने वाले आपके हृदय को समझने और उसमें सहभागी होने दीजिए। जब सब कुछ समाप्त होता हुआ दिखाई दे, तब भी काम करते रहने वाले परमेश्वर को देखकर ठूँठ की आशा पकड़े रहने दीजिए। आमीन।

Thursday, 29 October 2026

जब दृष्टि परमेश्वर से हटती है, तब जीवन के मापदण्ड भी बिगड़ जाते हैं

 

    30 अक्टूबर 2026

    यशायाह 5:8-30

    1. हाय उन पर जो घर से घर और खेत से खेत यहाँ तक मिलाते जाते हैं कि कुछ स्थान नहीं बचता, ताकि तुम देश में अकेले रह जाओ।
    2. सेनाओं के यहोवा ने मेरे सुनते कहा है: "निश्चय बहुत से घर सुनसान हो जाएँगे, और बड़े बड़े और सुन्दर घर निर्जन हो जाएँगे।
    3. क्योंकि दस बीघे की दाख की बारी से एक ही बत दाखमधु मिलेगा, और होमेर भर क बीज से एक ही एपा अन्न उत्पन्न होगा।"
    4. हाय उन पर जो बड़े तड़के उठकर मदिरा पीने लगते हैं और बड़ी रात तक दाखमधु पीते रहते हैं जब तक उनको गर्मी न चढ़ जाए!
    5. उनके भोजों में वीणा, सारंगी, डफ, बाँसली और दाखमधु, ये सब पाये जाते हैं; परन्तु वे यहोवा के कार्य की ओर दृष्टि नहीं करते, और उनके हाथों के काम को नहीं देखते।
    6. इसलिए अज्ञानता के कारण मेरी प्रजा बँधुआई में जाती है, उसके प्रतिष्ठित पुरुष भूखों मरते और साधारण लोग प्यास से व्याकुल होते हैं।
    7. इसलिए अधोलोक ने अत्यन्त लालसा करके अपना मुँह बेपरिमाण पसारा है, और उनका वैभव और भीड़-भीड़ और आनन्द करने वाले सब के सब उसके मुँह में जा पड़ते हैं।
    8. साधारण मनुष्य दबाए जाते हैं और बड़े मनुष्य नीचे किए जाते हैं, और अभिमानियों की आँखें नीची की जाती हैं।
    9. परन्तु सेनाओं का यहोवा न्याय करने के कारण महान ठहरता, और पवित्र परमेश्वर धर्मी होने के कारण पवित्र ठहरता है!
    10. तब भेड़ों के बच्चे मानो अपने खेत में चरेंगे, परन्तु ह्रष्टपुष्टों के उजड़े स्थान परदेशियों को चराई के लिए मिलेंगे।
    11. हाय उन पर जो अधर्म को अनर्थ की रस्सियों से और पाप को मानो गाड़ी के रस्से से खींच ले आते हैं,
    12. जो कहते हैं, "वह फुर्ती करे और अपने काम को शीघ्र करे कि हम उसको देखें; और इस्राएल के पवित्र की युक्ति प्रगट हो, वह निकट आए कि हम उसको समझें!"
    13. हाय उन पर जो बुरे को भला और भले को बुरा कहते, ज अँधियारे को उजियाला और उजियाले को अँधियारा ठहराते, और कड़वे को मीठा और मीठे को कड़वा करके मानते हैं!
    14. हाय उन पर जो अपनी दृष्टि में ज्ञानी और अपनी लेखे बुद्धिमान हैं!
    15. हाय उन पर जो दाखमधु पीने में वीर और मदिरा को तेज बनाने में बहादुर हैं,
    16. जो घूस लेकर दुष्टों को निर्दोष, और निर्दोषों को दोषी ठहराते हैं!
    17. इस कारण जैसे अग्रि की लौ से खूँटी भस्म होती है और सूखी घास जलकर बैठ जाती है, वैसे ही उनकी जड़ सड़ जाएगी और उनके फूल धूल होकर उड़ जाएँगे; क्योंकि उन्होंने सेनाओं के यहोवा की व्यवस्था को निकम्मी जाना, और इस्राएल के पवित्र के वचन को तुच्छ जाना है।
    18. इस कारण यहोवा का क्रोध अपनी प्रजा पर भड़का है, और उसने उनके विरुद्ध हाथ बढ़ाकर उनको मारा है, और पहाड़ काँप उठे; और लोगों के शव सड़कों के बीच कूड़ा-से पड़े हैं। इतने पर भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ और उसका हाथ अब तक बढ़ा हुआ है।
    19. वह दूर दूर की जातियों के लिए झण्डा खड़ा करेगा, और सीटी बजाकर उनको पृथ्वी की छोर स  बुलाएगा; देखो, वे फुर्ती करके वेग से आएँगे!
    20. उनमें कोई थका नहीं न कोई ठोकर खाता है; कोई ऊँघने या सोनेवाला नहीं, किसी का फेंटा नहीं खुला, और किसी के जूतों का बन्धन नहीं टूटा;
    21. उनके तीर तेज और धनुष चढ़ाए हुए हैं, उनके घोड़ों के खुर वज्र के से और रथों के पहिये बवण्डर सरीखे हैं।
    22. वे सिंह या जवान सिंह के समान गरजते हैं; वे गुर्राकर अहेर को पकड़ लेते और उसको ले भागते हैं, और कोई उसे उन से नहीं छुड़ा सकता।
    23. उस समय वे उन पर समुद्र के गर्जन के समान गर्जेंगे और यदि कोई देश की ओर देखे, तो उसे अन्धकार और संकट देख पड़ेगा और ज्योति मेघों से छिप जाएगी।

     

    मनन — जब दृष्टि परमेश्वर से हटती है, तब जीवन के मापदण्ड भी बिगड़ जाते हैं

    यशायाह 5:8–30 हमें दिखाता है कि पहले भाग में बताई गई निकम्मी दाखें वास्तव में जीवन में कैसी दिखाई देती हैं। यहाँ बार-बार “हाय” कहा गया है। बहुत अधिक पाने की लालसा, भोग-विलास, पाप को पकड़े रहना, परमेश्वर को परखना, भले और बुरे को उलट देना, अपनी बुद्धि को अन्तिम मानना, और शक्ति का अन्याय के लिए उपयोग करना—ये सब उसी निकम्मी दाख के रूप हैं।

    लेकिन इन सबकी जड़ एक ही है:

    परमेश्वर को न देखना।

    लोग घर से घर और खेत से खेत मिलाते गए। समस्या केवल सम्पत्ति की नहीं थी। समस्या यह थी कि वे परमेश्वर की दी हुई वस्तुओं को परमेश्वर से अधिक प्रेम करने लगे।

    तब परमेश्वर का वरदान भी दूसरों को जगह देने की बजाय, दूसरों को हटाकर अपने लिए अधिक लेने का साधन बन गया।

    जब हम परमेश्वर की वस्तुओं को परमेश्वर से अधिक प्रेम करते हैं, तब परमेश्वर के वरदान भी दूसरों को पीछे धकेलने का साधन बन सकते हैं।

    उनके जीवन में संगीत था, भोज था, दाखमधु था, आनन्द था। लेकिन वचन कहता है:

    “वे यहोवा के कार्य की ओर दृष्टि नहीं करते, और उनके हाथों के काम को नहीं देखते।”

    समस्या आनन्द में नहीं थी। समस्या यह थी कि आनन्द के बीच परमेश्वर दिखाई नहीं दे रहे थे।

    मनुष्य बहुत-सी खुशियाँ पा सकता है, लेकिन खुशी और विश्राम एक बात नहीं हैं।

    खुशी परिस्थितियाँ दे सकती हैं, लेकिन सच्चा विश्राम केवल परमेश्वर में मिलता है।

    परमेश्वर के बिना आनन्द हमें और अधिक उत्तेजना की ओर खींच सकता है, लेकिन परमेश्वर में मिलने वाला विश्राम हमें उनके भीतर ठहरना सिखाता है।

    उनके पास उत्सव था, लेकिन विश्राम नहीं था। संगीत था, लेकिन परमेश्वर को देखने वाली आँख नहीं थी।

    फिर वचन उन लोगों की बात करता है जो पाप को रस्सियों से खींचते हुए साथ लिए चलते हैं और परमेश्वर से कहते हैं कि वे जल्दी अपना काम करके दिखाएँ।

    यह विश्वास नहीं है। यह परमेश्वर को परखना है।

    वे परमेश्वर की आज्ञा मानना नहीं चाहते, बल्कि चाहते हैं कि परमेश्वर स्वयं को उनके सामने सिद्ध करें।

    लेकिन विश्वास का अर्थ यह नहीं कि हम परमेश्वर से कहें, “अपने आपको सिद्ध करो।”

    विश्वास का अर्थ है परमेश्वर की परमप्रधानता को मानना और उन पर निर्भर रहना।

    जब दृष्टि परमेश्वर से हटती है, तब भले और बुरे का मापदण्ड भी बदल जाता है।

    वचन कहता है कि वे बुरे को भला और भले को बुरा कहते हैं, अन्धकार को प्रकाश और प्रकाश को अन्धकार कहते हैं।

    जब परमेश्वर मापदण्ड नहीं रहते, तब मनुष्य स्वयं मापदण्ड बन जाता है।

    फिर जो मुझे अच्छा लगे, वह अच्छा बन जाता है; और जो मुझे पसंद न हो, वह बुरा कहा जाने लगता है।

    जो मनुष्य परमेश्वर को खो देता है, वह भले और बुरे को मिटाता नहीं; वह स्वयं भले और बुरे का निर्णायक बन बैठता है।

    इसीलिए अगला वचन कहता है:

    “हाय उन पर जो अपनी दृष्टि में ज्ञानी हैं।”

    यह केवल बुद्धि की समस्या नहीं है। यह निर्भरता की समस्या है।

    वे परमेश्वर से नहीं पूछते, वचन के सामने अपने विचार नहीं रखते, बल्कि अपनी समझ को अन्तिम बना लेते हैं।

    इसलिए विश्वास का अर्थ यह नहीं कि मैं ऐसा मनुष्य बन जाऊँ जो सब कुछ स्वयं तय कर सके।

    विश्वास यह है कि मैं अपने निर्णयों को भी परमप्रधान परमेश्वर के अधीन रखूँ।

    फिर वचन उन लोगों की बात करता है जिनमें क्षमता थी, पर उस क्षमता का उपयोग गलत दिशा में हुआ। वे दाखमधु पीने में “वीर” थे, और घूस लेकर दुष्टों को निर्दोष और निर्दोषों को दोषी ठहराते थे।

    समस्या क्षमता में नहीं थी। समस्या यह थी कि उनकी शक्ति परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करने के लिए उपयोग नहीं हुई।

    धन, ज्ञान, अधिकार, प्रतिभा और सामाजिक स्थान—ये सब परमेश्वर के वरदान हो सकते हैं।

    लेकिन यदि हम परमेश्वर को न देखें, तो यही वरदान हमारी इच्छा और अन्याय को बढ़ाने के साधन बन सकते हैं।

    और पद 24 इन सबकी सबसे गहरी जड़ बताता है:

    “उन्होंने सेनाओं के यहोवा की व्यवस्था को निकम्मी जाना, और इस्राएल के पवित्र के वचन को तुच्छ जाना है।”

    अन्ततः समस्या केवल यह नहीं थी कि उन्होंने वचन तोड़ा।

    उन्होंने वचन बोलने वाले परमेश्वर को तुच्छ जाना।

    और उन्होंने उस परमेश्वर की सामर्थ्य और विश्वासयोग्यता को हल्का समझा जो अपने वचन को पूरा करते हैं।

    उनका व्यवहार मानो ऐसा था:

    “क्या सच में परमेश्वर वैसा करेंगे जैसा उन्होंने कहा है?”

    इसी कारण उन्होंने चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया और अपने जीवन को नहीं बदला।

    लेकिन परमेश्वर की बात खाली बात नहीं है।

    परमेश्वर बोलते हैं, और जो बोलते हैं उसे पूरा करते हैं।

    इसलिए आगे आने वाला न्याय अचानक क्रोध में किया गया काम नहीं है।

    वह उस वचन का इतिहास में पूरा होना है जिसे परमेश्वर पहले ही कह चुके थे।

    परमेश्वर का न्याय बदलते हुए क्रोध का परिणाम नहीं, बल्कि उनके कहे हुए वचन का विश्वासयोग्य पूरा होना है।

    इस भाग में दिखाई देने वाली छह निकम्मी दाखें इस प्रकार हैं:

    1. लगातार अधिक पाने की लालसा
    2. भोग-विलास में पड़कर परमेश्वर के काम को न देखना
    3. पाप को पकड़े रहना और परमेश्वर को परखना
    4. भले और बुरे के मापदण्ड को उलट देना
    5. अपनी बुद्धि को अन्तिम मापदण्ड बनाना
    6. शक्ति और अधिकार का अन्याय के लिए उपयोग करना

    लेकिन इन सबकी जड़ एक ही है:

    परमेश्वर को न देखना।

    और इससे भी गहराई में:

    परमेश्वर को न देखने वाले जीवन की जड़ यह है कि वह वचन बोलने वाले परमेश्वर और अपने वचन को पूरा करने वाली उनकी सामर्थ्य को हल्का समझता है।

    इसलिए यशायाह 5 की समस्या केवल व्यवहार सुधारने से हल नहीं होती।

    हमें फिर से परमेश्वर को देखना है।

    फिर से उनके वचन को गंभीरता से लेना है।

    और फिर से परमेश्वर को अपने जीवन का मापदण्ड बनाना है।

    जब हम परमेश्वर को देखते हैं, तब उनके वरदान बाँटने का माध्यम बनते हैं, आनन्द धन्यवाद बनता है, हमारी समझ वचन के अधीन आती है, और हमारी क्षमता दूसरों को उठाने का साधन बनती है।

    अन्ततः

    यशायाह 5:8–30 दिखाता है कि जब मनुष्य की दृष्टि परमेश्वर से हटती है, तब जीवन के मापदण्ड भी टूट जाते हैं।

    परमेश्वर का वरदान लालसा बन जाता है,

    आनन्द विश्राम की जगह लेने लगता है,

    अपनी सोच सत्य बन जाती है,

    शक्ति अन्याय का साधन बन जाती है,

    और अन्त में परमेश्वर का वचन भी हल्का लगने लगता है।

    इसलिए आज का मुख्य वाक्य है:

    जब दृष्टि परमेश्वर से हटती है, तब जीवन के मापदण्ड टूटते हैं; और जब मापदण्ड टूटते हैं, तब निकम्मी दाखें लगती हैं।

    और एक वाक्य और:

    जो मनुष्य परमेश्वर को देखता और उनके वचन पर विश्वास करता है, वह उनके वरदानों को सही रीति से उपयोग करता है, परमेश्वर में सच्चा विश्राम पाता है, और उनके स्वभाव के अच्छे फल देता है।

    मनन के प्रश्न

    1. क्या मेरे जीवन में कोई ऐसा क्षेत्र है जहाँ मैं परमेश्वर से अधिक उनकी दी हुई वस्तुओं को देख रहा हूँ?
    2. क्या मेरे आनन्द के बीच परमेश्वर दिखाई देते हैं?
    3. क्या मैं परमेश्वर के वचन को सचमुच ऐसा वचन मानता हूँ जो पूरा होकर रहेगा?

    प्रार्थना

    हे परमेश्वर, मेरी दृष्टि आपकी वस्तुओं पर नहीं, आप पर लगी रहे। संसार की खुशियों से सच्चे विश्राम को बदलने न दूँ, बल्कि आप में विश्राम करना सीखूँ।

    मेरी सोच से अधिक आपके वचन पर भरोसा करना सिखाइए, और यह मानने दीजिए कि आप जो कहते हैं उसे पूरा करते हैं। मेरे जीवन में निकम्मी दाखें नहीं, बल्कि आपके स्वभाव के अच्छे फल प्रकट हों। आमीन।