Wednesday, 21 October 2026

प्रेम अन्त तक थामे रखता है, रक्षा करता है और प्रतीक्षा करता है

 

    22 अक्टूबर 2026

    श्रेष्ठगीत 8:1-14

    1. भला होता कि तू मेरे भाई के समान होता, जिसने मेरी माता की छातियों से दूध पिया! तब मैं तुझ बाहर पाकर तेरा चुम्बन लेती, और कोई मेरी निन्दा न करता।
    2. मैं तुझ को अपनी माता के घर ले चलती, और वह मुझ को सिखाती, और मैं तुझे मसाला मिला हुआ दाखमधु, और अपन अनारों का रस पिलाती।
    3. काश, उसका बायाँ हाथ मेरे सिर क नीचे होता, और अपन दाहिने हाथ से वह मेरा आलिंगन करता!
    4. हे यरूशलेम की पुत्रियों, मैं तुम को शपथ धराती हूँ, कि तुम मेरे प्रेमी को न जगाना जब तक वह स्वयं न उठना चाहे।
    5. यह कौन है जो अपने प्रेमी पर टेक लगाए हुए जंगल से चली आती है? सब क पेड़ के नीचे मैं ने तुझे जगाया। वहाँ तेरी माता ने तुझे जन्म दिया वहाँ तेरी माता को पीड़ाएँ उठीं।
    6. मुझे नगीन के समान है अपन ह्रदय पर लगा रख, और ताबीज के समान अपनी बाँह पर रख; और ताबीज के समान अपनी बाँह पर रख: क्योंकि प्रेम मृत्यु के तुल्य सामर्थी है, और ईर्ष्या कब्र के समान निर्दयी है। उसकी ज्वाला अग्रि की दमक है वरन् परमेश्वर ही की ज्वाला है।
    7. पानी की बाढ़ से भी प्रेम नहीं बुझ सकता, और न महानदों से डूब सकता है। यदि कोई अपन घर की सारी सम्पत्ति प्रेम के बदले दे दे तौभी वह अत्यन्त तुच्छ ठहरेगी।
    8. हमारी एक छोटी बहिन है, जिसकी छातियाँ अभी नहीं उभरीं। जिस दिन हमारी बहिन के ब्याह की बात लगे, उस दिन उसके लिए क्या करें?
    9. यदि वह शहरपनाह होती तो हम उस पर चाँदी का कंगूरा बनाते: और यदि वह फाटक होती तो हम उस पर देवदारु की लकड़ी के पटरे लगाते।
    10. मैं शहरपनाह थी और मेरी छातियाँ उसके गुम्मट; तब मैं अपने प्रेमी की दृष्टि में शान्ति लानेवाले के समान थी।
    11. बाल्हामोन में सुलैमान की एक दाख की बारी थी: उसने वह दाख की बारी रखवालों को सौंप दी: हर एक रखवाले को उसके फलों के लिए चाँदी के हजार टुकड़े देने थे।
    12. मेरी निज दाख की बारी मेरे ही लिए है; हे सुलैमान, हजार तुझी को और फल के रखवालों को दो सौ मिलें।
    13. तू जो बारियों में रहती है, मेरे मित्र तेरा बोल सुनता चाहते हैं; उसे मुझे भी सुनने दे।
    14. हे मेरे प्रेमी, शीघ्रता कर, और सुगन्धद्रव्यों के पहाड़ों पर चिकारे या जवान हरिण के समान बन जा।

     

    मनन — प्रेम अन्त तक थामे रखता है, रक्षा करता है और प्रतीक्षा करता है

    श्रेष्ठगीत 8 पूरे श्रेष्ठगीत की प्रेम-कथा को समेटने वाला अध्याय है। पिछले अध्यायों में हमने प्रेम के भीतर अपना मूल्य, अपनापन, साथ चलना और बुलाहट देखी। अब अन्तिम अध्याय में प्रेम का सबसे गहरा रूप सामने आता है।

    प्रेम केवल भावना नहीं है।

    प्रेम अन्त तक थामता है,

    रक्षा करता है,

    प्रतीक्षा करता है।

    स्त्री चाहती है कि वह अपने प्रेमी से खुले रूप में प्रेम कर सके। वह अपने प्रेम को छिपाना नहीं चाहती।

    इससे हम देखते हैं कि प्रेम जब गहरा होता है, तब वह केवल भीतर छिपा हुआ भाव नहीं रहता। वह जीवन में दिखाई देने लगता है।

    परमेश्वर के साथ भी ऐसा ही है।

    परमेश्वर से प्रेम करना केवल हृदय की निजी भावना नहीं है। वह हमारे शब्दों, चुनावों, सम्बन्धों और जीवन की दिशा में दिखाई देता है।

    लेकिन प्रेम केवल खुलकर प्रकट होने का नाम नहीं है।

    4 पद में फिर वही बात आती है:

    प्रेम को तब तक न जगाओ जब तक वह स्वयं न उठना चाहे।

    यह हमें याद दिलाता है:

    सच्चा प्रेम गहरा होता है, लेकिन वह जबरदस्ती नहीं करता।

    प्रेम दूसरे व्यक्ति पर अधिकार जमाकर उसे मजबूर नहीं करता।

    वह प्रतीक्षा करना जानता है।

    समय का सम्मान करता है।

    दूसरे को स्वतंत्र रूप से उत्तर देने का अवसर देता है।

    प्रेम बलपूर्वक पकड़ना नहीं, बल्कि स्वतंत्र उत्तर के लिए प्रतीक्षा करना है।

    फिर 5 पद में श्रेष्ठगीत के सबसे सुन्दर चित्रों में से एक दिखाई देता है:

    “यह कौन है जो अपने प्रेमी पर टेक लगाए हुए जंगल से चली आती है?”

    अब स्त्री अपने प्रेमी पर टेक लगाए हुए आगे बढ़ रही है।

    श्रेष्ठगीत की शुरुआत में वह दूसरों की दृष्टि से परेशान थी। उसे अपने रूप और अपनी स्थिति की चिंता थी।

    लेकिन अन्त में वह अपने प्रेमी पर भरोसा करके चल रही है।

    यह प्रेम की परिपक्वता का चित्र है।

    प्रेम हमें अकेले मजबूत बनने की शिक्षा नहीं देता; प्रेम हमें भरोसा करके टेक लगाना सिखाता है।

    परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में भी यही सत्य है।

    विश्वास में परिपक्व होने का अर्थ यह नहीं कि एक दिन हमें परमेश्वर की आवश्यकता नहीं रहेगी।

    इसके विपरीत:

    परिपक्व विश्वास का अर्थ है परमेश्वर पर और गहराई से निर्भर होना।

    परमेश्वर परमप्रधान हैं।

    हम उनसे जीवन पाने वाले प्राणी हैं।

    इसलिए सच्ची परिपक्वता स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सही निर्भरता है।

    फिर 6 पद में श्रेष्ठगीत का सबसे शक्तिशाली कथन आता है:

    “प्रेम मृत्यु के तुल्य सामर्थी है।”

    प्रेम को यहाँ मृत्यु के समान शक्तिशाली बताया गया है।

    और उसकी ज्वाला को परमेश्वर की ज्वाला के समान कहा गया है।

    इसका अर्थ है कि प्रेम हल्की भावना नहीं है।

    सच्चा प्रेम समय,

    दूरी,

    कठिनाई,

    निराशा और परिवर्तन के बीच भी बना रह सकता है।

    7 पद कहता है:

    बहुत-सा जल भी प्रेम को बुझा नहीं सकता, और नदियाँ भी उसे बहा नहीं सकतीं।

    यह प्रेम की स्थिरता को दिखाता है।

    सच्चा प्रेम अच्छी परिस्थिति से पैदा हुई भावना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थिति में भी बना रहने वाला विश्वासयोग्य सम्बन्ध है।

    परमेश्वर का प्रेम भी ऐसा ही है।

    परमेश्वर केवल तब हमसे प्रेम नहीं करते जब हम सब कुछ सही करते हैं।

    उनका प्रेम हमसे पहले शुरू हुआ।

    हमारी असफलताओं से अधिक गहरा है।

    और हमें अन्त तक थामे रखता है।

    श्रेष्ठगीत कहता है:

    “प्रेम मृत्यु के तुल्य सामर्थी है।”

    लेकिन सुसमाचार हमें इससे भी आगे ले जाता है।

    यीशु मसीह के क्रूस और पुनरुत्थान में हम देखते हैं कि परमेश्वर का प्रेम मृत्यु से होकर गुज़रा और मृत्यु पर विजय पाया।

    इसलिए हम कह सकते हैं:

    परमेश्वर का प्रेम केवल मृत्यु के समान शक्तिशाली नहीं; मसीह में वह मृत्यु से भी अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुआ।

    और इस प्रेम को पैसे से खरीदा भी नहीं जा सकता।

    7 पद कहता है कि यदि कोई अपना पूरा घर-बार प्रेम के बदले दे, तब भी वह तुच्छ माना जाएगा।

    प्रेम खरीदा नहीं जा सकता।

    उसे धन से नहीं खरीदा जा सकता।

    उपलब्धियों से नहीं पाया जा सकता।

    अपने कामों से कमाया नहीं जा सकता।

    परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में भी यही बात सत्य है।

    हम सेवा करके परमेश्वर का प्रेम नहीं खरीदते।

    हम अधिक प्रार्थना करके प्रेम पाने के योग्य नहीं बनते।

    हम अपनी उपलब्धियों से परमेश्वर का प्रेम हासिल नहीं करते।

    परमेश्वर का प्रेम कमाया नहीं जाता; वह अनुग्रह से पाया जाता है।

    इसलिए फिर से वह महत्वपूर्ण वाक्य याद आता है:

    सेवा प्रेम का स्थान लेने वाली चीज़ नहीं, बल्कि प्रेम का फल होनी चाहिए।

    8–10 पद में छोटी बहिन का उल्लेख आता है, जो अभी पूरी तरह बड़ी नहीं हुई है।

    परिवार सोचता है कि उसकी रक्षा कैसे की जाए।

    यहाँ प्रेम का एक और रूप दिखाई देता है।

    प्रेम अपरिपक्व व्यक्ति का उपयोग नहीं करता; उसकी रक्षा करता है।

    प्रेम विकास को मजबूर नहीं करता।

    वह दूसरे व्यक्ति की तैयारी का सम्मान करता है।

    वह सीमाएँ बनाता है।

    रक्षा करता है।

    और बढ़ने का समय देता है।

    प्रेम विकास की गति का सम्मान करता है।

    परमेश्वर भी हमारी वृद्धि की गति जानते हैं।

    वे सभी लोगों को एक ही गति से आगे नहीं धकेलते।

    कभी सिखाते हैं,

    कभी प्रतीक्षा करते हैं,

    कभी रक्षा करते हैं,

    और धीरे-धीरे परिपक्व बनाते हैं।

    10 पद में स्त्री कहती है:

    “मैं शहरपनाह थी।”

    अब वह अपने आपको एक स्थिर और मजबूत व्यक्ति के रूप में पहचानती है।

    श्रेष्ठगीत 1 में वह दूसरों की दृष्टि से अस्थिर थी।

    लेकिन अब वह प्रेम के भीतर बढ़ चुकी है।

    वह अपने मूल्य को जानती है।

    अपनी सीमाओं को जानती है।

    और अपने सम्बन्ध में स्थिर है।

    सच्चा प्रेम किसी को निर्भर और कमजोर बनाकर नहीं रखता; प्रेम के भीतर उसे परिपक्व और स्थिर बनाता है।

    11–12 पद में दाख की बारी फिर सामने आती है।

    श्रेष्ठगीत में दाख की बारी बार-बार प्रेम और फल की तस्वीर रही है।

    लेकिन अब इसमें जिम्मेदारी का अर्थ भी जुड़ जाता है।

    स्त्री अपनी दाख की बारी की बात करती है।

    यह दिखाता है कि प्रेम केवल फल का आनन्द लेने का नाम नहीं है।

    प्रेम उस चीज़ की देखभाल भी करता है जो हमें सौंपी गई है।

    परमेश्वर ने हमें भी बहुत कुछ सौंपा है।

    समय,

    शरीर,

    सम्बन्ध,

    वरदान,

    योग्यता,

    अवसर,

    और बुलाहट।

    परमेश्वर का होना इसका अर्थ नहीं कि हम अपने जीवन को जैसे चाहें वैसे उपयोग करें।

    बल्कि:

    जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर द्वारा सौंपी गई अपनी जीवन-बारी की जिम्मेदारी से देखभाल करता है।

    प्रेम जिम्मेदारी को जन्म देता है।

    फिर 13 पद में प्रेमी स्त्री की आवाज़ सुनना चाहता है।

    “मुझे भी अपना बोल सुनने दे।”

    यह बहुत सुन्दर बात है।

    परमेश्वर केवल हमारा काम नहीं चाहते।

    वे हमारी आवाज़ चाहते हैं।

    हमारी प्रार्थना,

    हमारा धन्यवाद,

    हमारी आराधना,

    हमारा प्रेम,

    हमारे हृदय का उत्तर।

    परमेश्वर मेरी सेवा से पहले मेरे प्रेम को चाहते हैं।

    और अन्तिम 14 पद में स्त्री कहती है:

    “हे मेरे प्रेमी, शीघ्रता कर…”

    श्रेष्ठगीत का अन्त भी प्रेमी की प्रतीक्षा से होता है।

    सारी यात्रा के बाद भी वह प्रेमी को चाहती है।

    यह बहुत महत्वपूर्ण है।

    परिपक्व प्रेम यह नहीं कहता:

    “अब मुझे तुम्हारी आवश्यकता नहीं।”

    बल्कि और गहराई से कहता है:

    “मैं तुम्हें और चाहता हूँ।”

    श्रेष्ठगीत का अन्तिम स्वर है:

    “हे मेरे प्रेमी, शीघ्रता कर।”

    और बाइबल के अन्त में प्रकाशित वाक्य में भी कलीसिया पुकारती है:

    “आमीन। हे प्रभु यीशु, आ।”

    हम यह नहीं कहते कि श्रेष्ठगीत 8 सीधे प्रकाशित वाक्य की भविष्यवाणी करता है। लेकिन पूरी बाइबल की दृष्टि से दोनों में एक सुन्दर समानता दिखाई देती है।

    परिपक्व प्रेम का अन्त प्रेमी से स्वतंत्र हो जाना नहीं, बल्कि उसकी उपस्थिति की और गहरी प्रतीक्षा करना है।

    श्रेष्ठगीत 1 से 8 अध्याय तक का प्रवाह

    अध्याय 1 — मूल्य

    परमेश्वर के प्रेम में मैं अपने मूल्य को पहचानता हूँ।

    मैं प्रेम पाया हुआ व्यक्ति हूँ।

    अध्याय 2 — अपनापन

    मैं जानता हूँ कि मैं किसका हूँ।

    मैं परमेश्वर का हूँ।

    अध्याय 3 — मेरी ओर आने वाला प्रेम

    मैं उस परमेश्वर को पहचानता हूँ जो मुझसे पहले मेरे पास आते हैं।

    परमेश्वर पहले मेरी ओर आते हैं।

    अध्याय 4 — पहचान और विकास

    परमेश्वर मुझे मेरे भीतर वह मूल्य देखने देते हैं जिसे मैं स्वयं नहीं देखता।

    परमेश्वर मेरे भीतर के मूल्य को पहचानते और बढ़ाते हैं।

    अध्याय 5 — वियोग और प्रेम की शुद्धता

    जब परमेश्वर दूर महसूस होते हैं तब भी मैं उनके वरदानों से अधिक स्वयं परमेश्वर को चाहता हूँ।

    परमेश्वर दिखाई न दें तब भी वे मेरे प्रिय हैं।

    अध्याय 6 — पुनःस्थापित पहचान

    मेरी असफलता मेरी अन्तिम पहचान नहीं है।

    मैं परमेश्वर का हूँ।

    अध्याय 7 — प्रेम से बुलाहट तक

    प्रेम सम्बन्ध बनाता है, सम्बन्ध साथ चलना सिखाता है, और साथ चलना बुलाहट को जन्म देता है।

    अध्याय 8 — वाचा का प्रेम और प्रतीक्षा

    सच्चा प्रेम मृत्यु से भी अधिक शक्तिशाली है, अन्त तक थामता है और प्रिय की प्रतीक्षा करता है।

    अन्ततः

    श्रेष्ठगीत 8 हमें प्रेम की परिपक्व अवस्था दिखाता है।

    प्रेम दूसरे पर अधिकार नहीं करता।

    वह स्वतंत्रता का सम्मान करता है।

    प्रतीक्षा करता है।

    रक्षा करता है।

    विकास को समय देता है।

    और जो कुछ सौंपा गया है उसकी जिम्मेदारी से देखभाल करता है।

    परमेश्वर का प्रेम भी ऐसा ही है।

    वे हमें प्रेम से थामते हैं,

    हमें परिपक्व करते हैं,

    और हमें ऐसा जीवन जीने के लिए बुलाते हैं जो उन्हें सौंपे हुए जीवन की जिम्मेदारी से देखभाल करे।

    और हम उस प्रेम में परमेश्वर पर टेक लगाकर चलते हैं।

    इसलिए पूरे श्रेष्ठगीत को इस प्रकार समेट सकते हैं:

    प्रेम मुझे मेरा मूल्य पहचानने देता है, मुझे परमेश्वर का होने की पहचान देता है, परमेश्वर के साथ चलना सिखाता है, बुलाहट में भेजता है, और अन्त में प्रिय प्रभु की प्रतीक्षा करना सिखाता है।

    और सबसे छोटे वाक्य में:

    प्रेम की शुरुआत भी सम्बन्ध है, उसकी यात्रा भी साथ चलना है, और उसका अन्त भी प्रतीक्षा है।

    मनन के प्रश्न

    1. क्या मैं परमेश्वर पर अधिक निर्भर होने को कमजोरी मानता हूँ, या परिपक्व विश्वास का चिन्ह?
    2. क्या मैं परमेश्वर का प्रेम पाने के लिए कुछ करने की कोशिश करता हूँ, या पहले से पाए हुए प्रेम के उत्तर में जीता हूँ?
    3. आज परमेश्वर ने मुझे कौन-सी “दाख की बारी” सौंपी है जिसकी मुझे विश्वासयोग्यता से रक्षा और देखभाल करनी है?

    प्रार्थना

    हे परमेश्वर, मुझे आपके उस प्रेम को गहराई से जानने दीजिए जिसे बहुत-सा जल भी बुझा नहीं सकता। अपनी शक्ति पर भरोसा करके अकेले खड़ा होने के बजाय, मुझे प्रेम करने वाले आप पर टेक लगाकर चलना सिखाइए।

    आपने जो जीवन, सम्बन्ध और बुलाहट मुझे सौंपी है, उसकी विश्वासयोग्यता से देखभाल करूँ। प्रेम पाने के लिए काम न करूँ, बल्कि पहले से पाए हुए प्रेम के उत्तर में जीऊँ। और जीवन के अन्त तक आपको और अधिक चाहूँ और यह कह सकूँ, “हे प्रभु यीशु, आइए।” आमीन।

     

Tuesday, 20 October 2026

प्रेम सम्बन्ध बनाता है, सम्बन्ध साथ चलना सिखाता है, और साथ चलना बुलाहट को जन्म देता है

 

    21 अक्टूबर 2026

    श्रेष्ठगीत 7:1-13

    1. हे कुलीन की पुत्री, तेरे पाँव जूतियों में क्या ही सुन्दर हैं! तेरी जाँघों की गोलाई ऐसे गहनों के समान है, जिसको किसी निपुण कारीगर ने रचा हो।
    2. तेरी नाभि गोल कटोरा है, जो मसाला मिले हुए दाखमधु से पूर्ण हो। तेरा पेट गेहूँ के ढेर के समान है जिसके चारों ओर सोसन फूल हों।
    3. तेरी दोनो छातियाँ मृगनी के दो जुड़वे बच्चों के समान हैं।
    4. तेरा गला हाथीदाँत की मानार है। तेरी आँखें हेशबोन के उन कुन्डों के समान हैं, जो बन्रब्बीम के फाटक के पास हैं। तेरी नाक लबानोन की मीनार क तुल्य है, जिसका मुख दमिश्क की ओर है। 
    5. तेरा सिर तुझ पर कर्मेल के समान शोभायमान है, और तेरे सिर की लटें बैंजनी रंग के वस्त्र के तुल्य हैं; राजा उन लटाओं में बँधुआ हो गया है।
    6. हे प्रिय और मनभावनी कुमारी, तू कैसा सुन्दरी और कैसी मनोहर है!
    7. तेरा डील-डौल खजूर के समान शानदार है और तेरी छातियाँ अंगूर क गुच्छों के समान हैं।
    8. मैं ने कहा, "मैं इस खजूर पर चढ़कर उसकी डालिओं को पकड़ूँगा।" तेरी छातियाँ अँगूर के गुच्छे हों, और तेरी श्वास का गुगन्ध सेबों के समान हो,
    9. और तेरे चुम्बन उत्तम दाखमधु के समान हैं। यह सरलता से ओठों पर से धीरे धीरे बह जाती है।
    10. मैं अपने प्रेमी की हूँ। और उसकी लालसा मेरी ओर नित बनी रहती है।
    11. हे मेरे प्रेमी, आ, हम खेतों में निकल जाएँ, और गाँवों में रहें;
    12. फिर सबेरे उठकर दाख की बारियों में चलें और देखें कि दाखलता में कलियें लगी हैं कि नहीं, कि दाख के फूल खिले हैं या नहीं, और अनार फूले हैं या नहीं। वहाँ मैं तुझ को अपना प्रेम दिखाऊँगी।
    13. दोदाफलों से सुगन्ध आ रही है, और हमारे द्वारों पर सब भाँति के उत्तम फल हैं, नये और पुराने भी, जो हे मेरे प्रेमी, मैं ने तेरे लिए इकट्ठे कर रखे हैं।

     

    मनन — प्रेम सम्बन्ध बनाता है, सम्बन्ध साथ चलना सिखाता है, और साथ चलना बुलाहट को जन्म देता है

    श्रेष्ठगीत 7 में हम प्रेम की परिपक्वता को देखते हैं। प्रेमी स्त्री की पूरी उपस्थिति को सुन्दर और मनभावनी मानता है। फिर स्त्री अपने प्रेमी के प्रेम में अपनी पहचान को स्थिर पाती है और उसके साथ खेतों और दाख की बारियों में निकलने का निमन्त्रण देती है।

    इस अध्याय में प्रेम से बुलाहट तक की एक सुन्दर यात्रा दिखाई देती है।

    प्रेमी स्त्री के वर्तमान रूप को देखकर आनन्दित होता है।

    सच्चा प्रेम किसी व्यक्ति को केवल उसकी उपयोगिता से नहीं देखता। वह यह नहीं पूछता, “यह व्यक्ति मेरे लिए क्या कर सकता है?” बल्कि पहले उस व्यक्ति के अस्तित्व को मूल्यवान मानता है।

    लेकिन प्रेम केवल वर्तमान को नहीं देखता।

    प्रेम व्यक्ति को उसके वर्तमान रूप में स्वीकार करता और उसमें आनन्दित होता है, और साथ ही उसके भीतर भविष्य में आने वाले फल को भी देखता है।

    प्रेम यह नहीं कहता,

    “जब तुम और अच्छे बनोगे, तब मैं तुमसे प्रेम करूँगा।”

    बल्कि पहले कहता है,

    “तुम अभी भी मेरे लिए प्रिय हो।”

    और फिर कहता है,

    “मैं तुम्हारे भीतर वह भी देखता हूँ जो अभी पूरी तरह प्रकट नहीं हुआ है।”

    परमेश्वर का प्रेम भी ऐसा ही है।

    परमेश्वर हमें इसलिए प्रेम नहीं करते कि भविष्य में हम बहुत योग्य या सफल बनेंगे। वे हमें अभी जानते और प्रेम करते हैं।

    लेकिन साथ ही वे जानते हैं कि उन्होंने हमारे भीतर कौन-सी सम्भावना, वरदान और फल रखे हैं।

    इसलिए:

    परमेश्वर का प्रेम वर्तमान के मुझे स्वीकार करता है और भविष्य में मेरे भीतर उगने वाले फल को भी देखता है।

    फिर 10 पद में स्त्री कहती है:

    “मैं अपने प्रेमी की हूँ, और उसकी लालसा मेरी ओर नित बनी रहती है।”

    यह श्रेष्ठगीत की सबसे गहरी घोषणाओं में से एक है।

    2 अध्याय में उसने कहा था:

    “मेरा प्रेमी मेरा है और मैं उसकी हूँ।”

    6 अध्याय में:

    “मैं अपने प्रेमी की हूँ और मेरा प्रेमी मेरा है।”

    और अब 7 अध्याय में:

    “मैं अपने प्रेमी की हूँ, और उसकी लालसा मेरी ओर है।”

    अब उसे बार-बार यह साबित करने की आवश्यकता नहीं कि वह प्रेम पाई हुई है।

    वह जानती है:

    “मैं उसकी हूँ।”

    और इससे भी अधिक:

    “वह मुझे चाहता है।”

    परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में यह बहुत गहरी सच्चाई है।

    परमेश्वर मुझे चाहते हैं।

    इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर में कोई कमी है या उन्हें हमारी आवश्यकता है। परमेश्वर पूर्ण हैं।

    लेकिन क्योंकि परमेश्वर प्रेम हैं, वे हमें प्रेम के सम्बन्ध में बुलाते हैं और हमारे साथ रहने में आनन्दित होते हैं।

    और हम यह भी कह सकते हैं:

    परमेश्वर मेरे प्रेम को चाहते हैं।

    परमेश्वर केवल मेरा काम नहीं चाहते।

    केवल मेरी सेवा नहीं।

    केवल मेरी योग्यता, धन या सफलता नहीं।

    वे पहले मुझे और मेरे प्रेम को चाहते हैं।

    लेकिन हमारी समस्या अक्सर उलटी होती है।

    परमेश्वर हमें चाहते हैं, लेकिन हम परमेश्वर की चीज़ें चाहते हैं।

    हम उनका आशीर्वाद चाहते हैं।

    प्रार्थना का उत्तर चाहते हैं।

    सुरक्षा चाहते हैं।

    सफलता चाहते हैं।

    शान्ति चाहते हैं।

    और कभी-कभी हम परमेश्वर से अधिक उन चीज़ों से प्रेम करने लगते हैं जो परमेश्वर देते हैं।

    लेकिन सच्चा प्रेम अलग है।

    प्रेम प्रिय व्यक्ति की चीज़ों को नहीं, प्रिय व्यक्ति को चाहता है।

    इसलिए हमारे विश्वास को भी यहाँ तक बढ़ना चाहिए:

    परमेश्वर की चीज़ों को चाहने से, स्वयं परमेश्वर को चाहने तक।

    उनके हाथ से मिलने वाली वस्तुओं से अधिक उनके मुख को चाहना।

    उत्तर मिले या न मिले,

    परिस्थिति बदले या न बदले,

    फिर भी यह कहना:

    “मैं आपको चाहता हूँ।”

    इसलिए हम कह सकते हैं:

    परमेश्वर मुझे चाहते हैं, और मैं परमेश्वर को चाहता हूँ।

    यही प्रेम का सम्बन्ध है।

    लेकिन श्रेष्ठगीत 7 यहाँ समाप्त नहीं होता।

    11 पद में स्त्री कहती है:

    “हे मेरे प्रेमी, आ, हम खेतों में निकल जाएँ।”

    यह बहुत महत्वपूर्ण वाक्य है।

    वह यह नहीं कहती:

    “तुम जाओ।”

    और न ही:

    “मैं अकेली जाऊँगी।”

    वह कहती है:

    “हम साथ चलें।”

    अब प्रेम केवल दो लोगों के बीच की भावना नहीं रह जाता।

    वह बाहर निकलता है।

    खेतों में जाता है।

    गाँवों में जाता है।

    दाख की बारियों में जाता है।

    यही परिपक्व प्रेम है।

    जब प्रेम गहरा होता है, तब साथ रहने की खुशी से आगे बढ़कर साथ मिलकर जीवन जीने और काम करने की ओर जाता है।

    परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध भी ऐसा ही है।

    हम परमेश्वर के साथ रहना चाहते हैं।

    प्रार्थना करते हैं।

    वचन पढ़ते हैं।

    आराधना करते हैं।

    उनकी उपस्थिति का आनन्द लेते हैं।

    लेकिन परमेश्वर के साथ प्रेम केवल इसी में समाप्त नहीं होता।

    एक समय आता है जब प्रभु हमें बुलाते हैं:

    “मेरे साथ चलो।”

    यहीं से बुलाहट शुरू होती है।

    इसलिए बुलाहट परमेश्वर से अलग होकर किया जाने वाला काम नहीं है।

    बुलाहट प्रेम करने वाले परमेश्वर के साथ संसार में आगे बढ़ना है।

    इसी स्थान पर श्रेष्ठगीत 7 का यह दृश्य यीशु के महानादेश के साथ बहुत सुन्दर रूप से जुड़ता है।

    यीशु ने अपने चेलों से कहा:

    “जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ।”

    लेकिन उन्होंने केवल इतना नहीं कहा।

    उन्होंने यह भी प्रतिज्ञा की:

    “देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।”

    इसलिए महानादेश केवल काम का आदेश नहीं है।

    महानादेश प्रेम का निमन्त्रण है, और सम्बन्ध का निमन्त्रण है।

    यीशु हमें यह नहीं कहते:

    “मुझे छोड़कर संसार में जाओ और मेरा काम करो।”

    बल्कि जैसे कहते हैं:

    “मेरे साथ संसार में चलो।”

    इसलिए हम कह सकते हैं:

    महानादेश यीशु के साथ संसार में आगे बढ़ने का प्रेमपूर्ण निमन्त्रण है।

    यह बहुत महत्वपूर्ण है।

    यदि हम सेवा करते-करते यीशु से दूर हो जाते हैं, तो कहीं न कहीं क्रम बदल गया है।

    हम यीशु से प्रेम करने के स्थान पर सेवा को नहीं रख सकते।

    हम यीशु के साथ रहने के स्थान पर यीशु के लिए बहुत काम करने को नहीं रख सकते।

    सेवा प्रेम का स्थान लेने वाली चीज़ नहीं, बल्कि प्रेम का फल होनी चाहिए।

    पहले प्रेम।

    फिर सम्बन्ध।

    उस सम्बन्ध से साथ चलना।

    और साथ चलने से बुलाहट।

    इसलिए आज का महत्वपूर्ण वाक्य है:

    प्रेम सम्बन्ध बनाता है, सम्बन्ध साथ चलना सिखाता है, और साथ चलना बुलाहट को जन्म देता है।

    12 पद में दोनों दाख की बारियों में जाते हैं।

    वे देखते हैं कि दाखलता में कलियाँ लगी हैं या नहीं,

    फूल खिले हैं या नहीं,

    अनार फूले हैं या नहीं।

    यह भी बहुत महत्वपूर्ण है।

    वे फल को जबरदस्ती पैदा करने नहीं जाते।

    वे उस जीवन को देखते हैं जो पहले से बढ़ रहा है।

    सेवा भी ऐसी ही है।

    हम जीवन पैदा नहीं कर सकते।

    हम किसी का हृदय बदल नहीं सकते।

    हम बीज बो सकते हैं,

    पानी दे सकते हैं,

    सिखा सकते हैं,

    सेवा कर सकते हैं,

    प्रतीक्षा कर सकते हैं।

    लेकिन बढ़ाने वाला परमेश्वर है।

    इसलिए सेवक फल का मालिक नहीं है।

    हम फल पैदा करने वाले नहीं, बल्कि फल बढ़ाने वाले परमेश्वर के साथ उनकी बारी की देखभाल करने वाले हैं।

    इसलिए सेवा के फल से पहले एक और फल को देखना चाहिए।

    परमेश्वर के साथ प्रेम के सम्बन्ध का फल।

    मेरे भीतर क्या बढ़ रहा है?

    क्या प्रेम बढ़ रहा है?

    क्या धैर्य बढ़ रहा है?

    क्या नम्रता बढ़ रही है?

    क्या दूसरों को स्वीकार करने वाला हृदय बढ़ रहा है?

    यही पहले है।

    और जब परमेश्वर के साथ प्रेम का फल हमारे भीतर बढ़ता है, तब हमारे द्वारा सेवा का फल भी दिखाई देने लगता है।

    इसलिए हम इस प्रकार कह सकते हैं:

    प्रेम का फल यह है कि मेरे भीतर क्या बढ़ रहा है; सेवा का फल यह है कि मेरे द्वारा क्या हो रहा है।

    इसका सही क्रम है:

    प्रेम का सम्बन्ध → मेरे भीतर फल → परमेश्वर के साथ चलना → सेवा → मेरे द्वारा फल

    12 पद के अन्त में स्त्री कहती है:

    “वहाँ मैं तुझ को अपना प्रेम दिखाऊँगी।”

    वह अपना प्रेम कहाँ दिखाएगी?

    दाख की बारी में।

    जीवन और काम के बीच।

    इसका अर्थ है कि परमेश्वर के लिए हमारा प्रेम केवल प्रार्थना और आराधना में ही प्रकट नहीं होता।

    लोगों की सेवा में,

    सुसमाचार सुनाने में,

    चेला बनाने में,

    दुखी लोगों को सम्भालने में,

    ज़रूरतमन्दों की सहायता करने में,

    और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीने में भी हमारा प्रेम प्रकट होता है।

    सेवा प्रेम से अलग कोई काम नहीं; यह परमेश्वर के साथ उनकी बारी में जाकर उस प्रेम को जीवन में प्रकट करना है।

    अन्तिम 13 पद में स्त्री कहती है कि नये और पुराने उत्तम फल उसने अपने प्रेमी के लिए रखे हैं।

    यह समर्पण का चित्र है।

    परमेश्वर ने हमारे भीतर जो बढ़ाया,

    हमारे वरदान,

    अनुभव,

    समय,

    योग्यता,

    सम्बन्ध,

    और यहाँ तक कि दुख से मिली सीख,

    सब फिर परमेश्वर को दिए जा सकते हैं।

    बुलाहट परमेश्वर को कुछ साबित करना नहीं, बल्कि परमेश्वर ने हमारे भीतर जो फल उगाया है उसे फिर उन्हीं को समर्पित करना है।

    श्रेष्ठगीत 1 से 7 अध्याय तक का प्रवाह

    अध्याय 1 — मूल्य

    मैं प्रेम पाया हुआ व्यक्ति हूँ।

    अध्याय 2 — अपनापन

    मैं परमेश्वर का हूँ।

    अध्याय 3 — मेरी ओर आने वाला प्रेम

    परमेश्वर मुझसे पहले मेरे पास आते हैं।

    अध्याय 4 — पहचान और विकास

    परमेश्वर मेरे भीतर वह मूल्य देखते हैं जिसे मैं स्वयं नहीं देखता, और उसे बढ़ाते हैं।

    अध्याय 5 — वियोग और प्रेम की शुद्धता

    परमेश्वर दिखाई न दें तब भी मैं स्वयं परमेश्वर को प्रेम करता हूँ।

    अध्याय 6 — पुनःस्थापित पहचान

    मेरी असफलता नहीं, बल्कि यह कि मैं परमेश्वर का हूँ, मेरी पहचान तय करता है।

    अध्याय 7 — प्रेम से बुलाहट की ओर

    मैं प्रेम करने वाले परमेश्वर के साथ संसार में आगे बढ़ता हूँ।

    अन्ततः

    श्रेष्ठगीत 7 हमें प्रेम की परिपक्वता दिखाता है।

    प्रेम वर्तमान के मुझे स्वीकार करता और उसमें आनन्दित होता है, और साथ ही भविष्य में आने वाले फल को भी देखता है।

    परमेश्वर केवल मेरी सेवा नहीं चाहते; वे मुझे चाहते हैं।

    इसलिए मुझे भी परमेश्वर की चीज़ों से अधिक स्वयं परमेश्वर को चाहना सीखना है।

    और यह प्रेम केवल निजी सम्बन्ध में नहीं रहता।

    प्रेम सम्बन्ध बनाता है, सम्बन्ध साथ चलना सिखाता है, और साथ चलना बुलाहट को जन्म देता है।

    इसीलिए महानादेश प्रेम का निमन्त्रण है, सम्बन्ध का निमन्त्रण है।

    यीशु हमें अकेले संसार में नहीं भेजते।

    वे कहते हैं:

    “मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

    इसलिए हमारी बुलाहट यीशु के लिए अकेले काम करना नहीं है।

    हमारी बुलाहट प्रेम करने वाले यीशु के साथ संसार की बारी में आगे बढ़ना है।

    और वहाँ हम उस फल को देखते हैं जिसे परमेश्वर बढ़ाते हैं, और फिर वही फल प्रेम से उन्हें समर्पित करते हैं।

    सेवा प्रेम का स्थान लेने वाली चीज़ नहीं, बल्कि प्रेम का फल होनी चाहिए।

    मनन के प्रश्न

    1. क्या मैं स्वयं परमेश्वर को चाहता हूँ, या परमेश्वर से मिलने वाली चीज़ों को अधिक चाहता हूँ?
    2. क्या मेरी सेवा परमेश्वर के साथ प्रेम के सम्बन्ध से निकल रही है, या मैंने सम्बन्ध की जगह सेवा को रख दिया है?
    3. आज यीशु मुझे किस “दाख की बारी” में यह कहते हुए बुला रहे हैं, “मेरे साथ चलो”?

    प्रार्थना

    हे परमेश्वर, मुझे आपकी चीज़ों से अधिक आपको प्रेम करना सिखाइए। मुझे यह गहराई से जानने दीजिए कि मैं आपका हूँ और आप मेरे साथ प्रेम के सम्बन्ध में आनन्दित होते हैं।

    मेरी सेवा कभी आपके साथ मेरे प्रेम का स्थान न ले, बल्कि उसी प्रेम का फल बने। आज भी प्रेम करने वाले यीशु के साथ संसार की बारी में आगे बढ़ूँ, जहाँ आप काम कर रहे हैं वहाँ आपके साथ विश्वासयोग्य होकर सेवा करूँ, और आपके द्वारा उगाए गए फल को आनन्द से फिर आपको समर्पित करूँ। आमीन।