Wednesday, 3 June 2026

परमेश्वर के घर में प्रेम और जिम्मेदारी सीखना - Love and Responsibility in the Household of God

 4/जून/2026

1 तीमुथियुस 5:1–16

1 किसी बूढ़े को न डाँट, पर उसे पिता जानकर समझा दे, और जवानों को भाई जानकर;

2 बूढ़ी स्त्रियों को माता जानकर; और जवान स्त्रियों को पूरी पवित्रता से बहिन जानकर समझा दे।

3 उन विधवाओं का, जो सचमुच विधवा हैं, आदर कर।

4 यदि किसी विधवा के बच्‍चे या नाती–पोते हों, तो वे पहले अपने ही घराने के साथ भक्‍ति का बर्ताव करना, और अपने माता–पिता आदि को उनका हक्‍क देना सीखें, क्योंकि यह परमेश्‍वर को भाता है।

5 जो सचमुच विधवा है, और उसका कोई नहीं, वह परमेश्‍वर पर आशा रखती है, और रात दिन विनती और प्रार्थना में लौलीन रहती है;

6 पर जो भोगविलास में पड़ गई, वह जीते जी मर गई है।

7 इन बातों की भी आज्ञा दिया कर ताकि वे निर्दोष रहें।

8पर यदि कोई अपनों की और निज करके अपने घराने की चिन्ता न करे, तो वह विश्‍वास से मुकर गया है और अविश्‍वासी से भी बुरा बन गया है।

9 उसी विधवा का नाम लिखा जाए जो साठ वर्ष से कम की न हो, और एक ही पति की पत्नी रही हो,

10 और भले काम में सुनाम रही हो, जिस ने बच्‍चों का पालन–पोषण किया हो; अतिथियों की सेवा की हो, पवित्र लोगों के पाँव धोए हों, दुखियों की सहायता की हो, और हर एक भले काम में मन लगाया हो।

11 पर जवान विधवाओं के नाम न लिखना, क्योंकि जब वे मसीह का विरोध करके सुख–विलास में पड़ जाती हैं तो विवाह करना चाहती हैं,

12 और दोषी ठहरती हैं, क्योंकि उन्होंने अपने पहले विश्‍वास को छोड़ दिया है।

13 इसके साथ ही साथ वे घर–घर फिरकर आलसी होना सीखती हैं, और केवल आलसी नहीं पर बकबक करती रहतीं और दूसरों के काम में हाथ भी डालती हैं और अनुचित बातें बोलती हैं।

14 इसलिये मैं यह चाहता हूँ कि जवान विधवाएँ विवाह करें, और बच्‍चे जनें और घरबार संभालें, और किसी विरोधी को बदनाम करने का अवसर न दें।

15 क्योंकि कई एक तो बहककर शैतान के पीछे हो चुकी हैं।

16 यदि किसी विश्‍वासिनी के यहाँ विधवाएँ हों, तो वही उनकी सहायता करे कि कलीसिया पर भार न हो, ताकि वह उनकी सहायता कर सके जो सचमुच विधवाएँ हैं।”

 

मनन —

परमेश्वर के घर में प्रेम और जिम्मेदारी सीखना

 

1 तीमुथियुस 5:1-16 में पौलुस बुज़ुर्गों, युवाओं, विधवाओं और परिवारों के बारे में बात करता है। ऊपरी रूप से देखने पर ऐसा लगता है कि वह केवल लोगों के साथ व्यवहार करने के तरीके सिखा रहा है।

लेकिन इसके पीछे एक बड़ा प्रश्न है:

“परमेश्वर के घर में रहने वाले लोगों को कैसे जीवन जीना चाहिए?”

पौलुस कलीसिया को केवल एक संगठन के रूप में नहीं देखता।

कलीसिया जीवते परमेश्वर का घर है, और परमेश्वर का परिवार है।

इसलिए वह कहता है:

  • वृद्ध पुरुषों को पिता के समान,
  • जवान पुरुषों को भाई के समान,
  • वृद्ध स्त्रियों को माता के समान,
  • और जवान स्त्रियों को बहनों के समान समझो।

क्योंकि कलीसिया केवल एक सभा नहीं, बल्कि परमेश्वर का परिवार है।

 

इसके बाद पौलुस विधवाओं के विषय में बात करता है।

उस समय विधवाएँ समाज के सबसे असहाय लोगों में गिनी जाती थीं।

लेकिन पौलुस यह नहीं कहता कि उनकी सारी जिम्मेदारी कलीसिया उठा ले।

 

वह पहले कहता है कि बच्चे और पोते-पोतियाँ अपने माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करना सीखें। यदि कोई रिश्तेदार है, तो उसे भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

 

क्योंकि परमेश्वर ने

पहले व्यक्ति को,

फिर परिवार को,

और उसके बाद कलीसिया को जिम्मेदारी सौंपी है।

 

इसलिए कलीसिया परिवार की जिम्मेदारी को समाप्त करने वाली जगह नहीं है,

बल्कि वह समुदाय है जो उस भार को उठाने में सहायता करता है जिसे परिवार स्वयं नहीं उठा सकता।

 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रारम्भिक कलीसिया ने यह सिद्धान्त संसाधनों की सीमितता के बीच सीखा। यदि उनके पास असीमित संसाधन होते, तो शायद वे यह तक नहीं सोचते कि कौन जिम्मेदारी उठाए, और परमेश्वर की व्यवस्था क्या है।

 

लेकिन कमी ने उन्हें परमेश्वर की व्यवस्था को समझने का अवसर दिया।

इस प्रकार विधवाओं का प्रश्न केवल आर्थिक सहायता का प्रश्न नहीं था,

बल्कि यह सीखने का अवसर था कि परमेश्वर के घर में प्रेम और जिम्मेदारी कैसे प्रवाहित होनी चाहिए।

 

पौलुस कहता है:

तो वो पहलों अपने ही घराने के साथ भक्ति का बर्ताव करना, और अपने माता-पिता आदि को अपने हक्क देना सीखें, क्योंकि यह परमेश्वर को भाता है।(4पद)

यहाँ महत्वपूर्ण शब्द है:

“सीखें”।

परमेश्वर परिवार की जिम्मेदारी के माध्यम से

  • प्रेम सिखाते हैं,
  • सेवा सिखाते हैं,
  • और अपना स्वभाव सिखाते हैं।

इसलिए विश्वास का अर्थ जिम्मेदारी को दूसरों पर डाल देना नहीं,

बल्कि परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी को विश्वासयोग्यता से निभाना है।

 

 

1 तीमुथियुस 5:1–16 हमें सिखाता है कि कलीसिया जीवते परमेश्वर का घर है।

परमेश्वर का घर जिम्मेदारी से भागने की जगह नहीं, बल्कि सौंपी गई जिम्मेदारी को निभाने की जगह है।

 

परमेश्वर पहले व्यक्ति को जिम्मेदारी देते हैं, फिर परिवार को, और अन्त में कलीसिया मिलकर उस भार को उठाती है।

परमेश्वर का राज केवल हमारी सभी आवश्यकताओं को तुरन्त पूरा कर देने में ही नहीं दिखाई देता। कई बार परमेश्वर कमी और सीमितता की परिस्थितियों के द्वारा हमें अपनी व्यवस्था और जिम्मेदारी सिखाते हैं।

इसलिए परमेश्वर का जन

कठिनाइयों और कमी के समय शिकायत करने के बजाय यह पूछता है:

“प्रभु, इस परिस्थिति में आपने मुझे कौन-सी जिम्मेदारी सौंपी है?”

और उसी जिम्मेदारी को निभाने के द्वारा वह प्रेम, सेवा और परमेश्वर के स्वभाव को सीखता है।

 

मनन के प्रश्न

  • क्या मैं कलीसिया को वास्तव में परमेश्वर का परिवार मानता हूँ?
  • क्या मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दी गई जिम्मेदारियों को विश्वासयोग्यता से निभा रहा हूँ?
  • क्या मैं कमी के समय शिकायत करता हूँ, या परमेश्वर की व्यवस्था को सीखता हूँ?
  • क्या मैं अपने परिवार और कलीसिया में प्रेम और सेवा का जीवन जी रहा हूँ?

 

प्रार्थना

हे प्रभु,

मुझे कलीसिया को जीवते परमेश्वर का घर और परिवार समझने की समझ दे।

मुझे जिम्मेदारी से भागने वाला नहीं,

बल्कि तेरे द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों को विश्वासयोग्यता से निभाने वाला बना। 

कमी और कठिनाइयों के समय शिकायत करने के बजाय,

मुझे तेरी व्यवस्था और तेरी शिक्षा को समझना सिखा।

मेरे परिवार और कलीसिया में

तेरा प्रेम,

तेरी सेवा,

और तेरा स्वभाव प्रकट हो।

मुझे ऐसा जीवन दे

जो दूसरों का भार उठाने में सहभागी हो।

यीशु मसीह के नाम में प्रार्थना करता हूँ।

आमीन।


Tuesday, 2 June 2026

जीवते परमेश्वर में आशा - Hope in the Living God

3/जून/2026

1 तीमुथियुस 4:9–16          

9 यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है।

10 क्योंकि हम परिश्रम और यत्न इसी लिये करते हैं कि हमारी आशा उस जीवते परमेश्‍वर पर है, जो सब मनुष्यों का और निज करके विश्‍वासियों का उद्धारकर्ता है।

11 इन बातों की आज्ञा दे और सिखाता रह।

12 कोई तेरी जवानी को तुच्छ न समझने पाए; पर वचन, और चाल–चलन, और प्रेम, और विश्‍वास, और पवित्रता में विश्‍वासियों के लिये आदर्श बन जा।

13 जब तक मैं न आऊँ, तब तक पढ़ने और उपदेश देने और सिखाने में लौलीन रह।

14 उस वरदान के प्रति जो तुझ में है, और भविष्यद्वाणी के द्वारा प्राचीनों के हाथ रखते समय तुझे मिला था, निश्‍चिन्त मत रह।

15 इन बातों को सोचते रह और इन्हीं में अपना ध्यान लगाए रह, ताकि तेरी उन्नति सब पर प्रगट हो।

16 अपनी और अपने उपदेश की चौकसी रख। इन बातों पर स्थिर रह, क्योंकि यदि ऐसा करता रहेगा तो तू अपने और अपने सुननेवालों के लिये भी उद्धार का कारण होगा।”

 

मनन —

जीवते परमेश्वर में आशा रखने वाला व्यक्ति

1 तीमुथियुस 4:9-16 में पौलुस तीमुथियुस को बताता है कि उसे क्या सिखाना है, कैसे जीवन जीना है, और किन बातों में लगातार बना रहना है।

सबसे पहले पौलुस कहता है:

“क्योंकि हम परिश्रम और यत्न इसीलिए करते हैं कि हमारी आशा उसी जीवते परमेश्वर पर है।” (पद 10)

 

परमेश्वर का जन की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं है कि उसके पास कितनी सामर्थ है, कितना ज्ञान है, या उसका कार्य कितना बड़ा है।

उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि

उसकी आशा जीवते परमेश्वर पर है।

संसार धन, सफलता और मनुष्यों पर आशा रखता है,

लेकिन परमेश्वर का जन

जीवते परमेश्वर पर आशा रखता है।

और वही आशा वह दूसरों को भी सिखाता है।

 

लेकिन पौलुस शिक्षा से पहले जीवन की बात करता है।

वचन, और चाल-चलन,  और प्रेम, और विश्वास, और पवित्रता में विश्वासियों के लिए आदर्श बन जा।” (पद 12)

 

लोग हमारे शब्दों को सुनने से पहले हमारे जीवन को देखते हैं।

इसलिए परमेश्वर का जन:

  • वचन में आदर्श बने,
  • आचरण में आदर्श बने,
  • प्रेम में आदर्श बने,
  • विश्वास में आदर्श बने,
  • और पवित्रता में आदर्श बने।

सच्चा अधिकार पद से नहीं, बल्कि जीवन से आता है।

 

पौलुस आगे कहता है:

उस वरदान के प्रति जो तुझ में है, ... निशिचन्त मत रह।” (पद 14)

 

वरदान हमने स्वयं नहीं बनाया।

वह परमेश्वर का दिया हुआ उपहार है।

इसलिए वरदान घमण्ड करने के लिये नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिये विश्वासयोग्यता से उपयोग करने के लिये दिया गया है।

 

फिर पौलुस कहता है:

इन बातों को सोचते रह और इन्हीं में अपना ध्यान लगाए रह, ताकि तेरी उन्नति सब पर प्रगट हो।” (पद 15)

 

यहाँ “उन्नति” केवल ज्ञान बढ़ने की बात नहीं है।

आत्मिक उन्नति है, इस का अर्थ है:

हमारे जीवन के अधिक से अधिक क्षेत्रों में परमेश्वर का राज स्थापित होना।

जब हमारे वचन, आचरण, प्रेम, विश्वास और पवित्रता में

यीशु मसीह का स्वभाव अधिक प्रकट होने लगे,

तब हम वास्तव में बढ़ रहे हैं

इसलिए आत्मिक उन्नति का अर्थ केवल अधिक जानना नहीं,

बल्कि अधिक से अधिक परमेश्वर-केन्द्रित जीवन जीना है।

 

अन्त में पौलुस कहता है:

अपनी और अपने उपदेश की चौकसी रख। इन बातों पर स्थिर रह, क्योंकि यदि ऐसा करता रहेगा तो तू अपने और अपने सुननेवालों के लिए भी उद्धार का कारण होगा।” (पद 16)

 

परमेश्वर का जन केवल अपने उपदेश को नहीं देखता,

वह अपने जीवन को भी जाँचता है।

जीवन और शिक्षा अलग नहीं हो सकते।

जीवन के बिना शिक्षा प्रभावहीन हो जाती है,

और शिक्षा के बिना जीवन दिशा खो देता है।

इसलिए परमेश्वर का जन प्रतिदिन अपने जीवन को परखता है

और परमेश्वर के वचन में बना रहता है।

 

1 तीमुथियुस 4:9–16 हमें सिखाता है कि

परमेश्वर का जन जीवते परमेश्वर में आशा रखता है,

परमेश्वर से प्राप्त वरदान के द्वारा सेवा करता है,

वचन, आचरण, प्रेम, विश्वास और पवित्रता में आदर्श बनता है,

और प्रतिदिन आत्मिक रूप से बढ़ता रहता है।

आत्मिक उनन्ति का अर्थ है:

यीशु मसीह का स्वभाव हमारे जीवन में अधिक प्रकट होना, और परमेश्वर का राज हमारे जीवन के अधिक क्षेत्रों में स्थापित होना।

 

मनन के प्रश्न

  • क्या मेरी आशा वास्तव में जीवते परमेश्वर पर है?
  • क्या मैं अपने शब्दों से अधिक अपने जीवन के द्वारा परमेश्वर को प्रकट कर रहा हूँ?
  • क्या मैं परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदान का विश्वासयोग्यता से उपयोग कर रहा हूँ?
  • क्या मैं केवल ज्ञान में बढ़ रहा हूँ, या परमेश्वर-केन्द्रित जीवन में भी बढ़ रहा हूँ?

 

प्रार्थना

हे प्रभु,

मेरी आशा मनुष्यों या परिस्थितियों में नहीं,

बल्कि जीवते परमेश्वर में हो।

मुझे वचन, आचरण, प्रेम, विश्वास और पवित्रता में

एक अच्छा उदाहरण बनने दे।

जो वरदान तूने मुझे दिया है,

उसे विश्वासयोग्यता से उपयोग करने में मेरी सहायता कर।

मुझे प्रतिदिन परमेश्वर-केन्द्रित जीवन में बढ़ने दे,

ताकि मेरे जीवन में यीशु मसीह का स्वभाव और अधिक प्रकट हो।

यीशु मसीह के नाम में प्रार्थना करता हूँ।

आमीन।