मुख्य विषय: परमेश्वर ने मनुष्य को अपने साथ सच्ची संगति में रहने के लिए बनाया।
मुख्य पद: उत्पत्ति 1:26–28; यूहन्ना 1:12; 1 यूहन्ना 1:3; मत्ती 28:18–20
परमेश्वर ने मनुष्य को केवल सृष्टि के एक प्राणी के रूप में नहीं बनाया। उन्होंने मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता में बनाया और अपने साथ संगति में रहने के लिए बुलाया। पाप के कारण यह संगति टूट गई, परन्तु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर ने हमें फिर से अपने निकट बुलाया और अपनी सन्तान होने का स्थान दिया।
इसलिए सच्ची संगति को समझने के लिए हमें चार महत्वपूर्ण विशेषताओं को समझना चाहिए—समृद्धि, सम्मान, समानता और सहभागिता।
1. समृद्धि — सच्ची संगति जीवन को बढ़ाती है
उत्पत्ति 1:27–28
परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया और उसे आशीष देकर कहा कि फूलो-फलो, पृथ्वी में भर जाओ और उस पर अधिकार रखो।
इस आज्ञा में हम परमेश्वर के मन को देखते हैं। परमेश्वर की इच्छा केवल यह नहीं थी कि आदम और हव्वा उनके साथ अकेले संगति में रहें। उन्होंने उन्हें आशीष दी कि उनका जीवन फले-फूले, बढ़े और पृथ्वी में भर जाए।
इसलिए समृद्धि का अर्थ केवल धन या भौतिक सम्पन्नता नहीं है। यहाँ समृद्धि का अर्थ है कि परमेश्वर से प्राप्त जीवन, प्रेम और भलाई हमारे भीतर बन्द न रहें, बल्कि हमारे द्वारा आगे बढ़ें और दूसरों तक पहुँचें।
सच्ची संगति बन्द संगति नहीं है। उसमें जीवन है, और जहाँ जीवन है वहाँ फल और बढ़ोतरी होती है।
मुख्य विचार:
परमेश्वर के साथ सच्ची संगति हमें जीवन देती है, और वह जीवन हमारे द्वारा आगे बढ़ता है।
सम्बन्धित पद: उत्पत्ति 1:27–28; यूहन्ना 15:4–5, 8, 16
2. सम्मान — परमेश्वर कौन हैं?
भजन संहिता 97:9; यशायाह 6:1–5
सच्ची संगति के लिए सामने वाले को सही रूप में पहचानना आवश्यक है।
सम्मान का अर्थ है—यह जानना कि मेरे सामने कौन है, और उसके अनुसार उसके साथ व्यवहार करना।
इसलिए परमेश्वर के साथ सच्ची संगति का पहला प्रश्न है:
“परमेश्वर कौन हैं?”
परमेश्वर परमप्रधान हैं। वे सृष्टिकर्ता हैं, प्रभु हैं और सब कुछ उन्हीं से है। इसलिए हम परमेश्वर को अपनी इच्छा के अनुसार छोटा बनाकर उनके साथ संगति नहीं कर सकते। हमें उन्हें वैसे ही जानना है जैसे वे वास्तव में हैं।
परमेश्वर हमारे पिता हैं, परन्तु वे फिर भी परमप्रधान परमेश्वर हैं। इसलिए उनके साथ निकटता उनके प्रति सम्मान को समाप्त नहीं करती।
मुख्य विचार:
सम्मान का अर्थ है परमेश्वर को सही रूप में जानना और उनके अनुसार उनके साथ व्यवहार करना।
सम्बन्धित पद: भजन संहिता 97:9; यशायाह 6:1–5; इब्रानियों 12:28
3. समानता — यीशु मसीह में मुझे किस सम्बन्ध में बुलाया गया है?
यूहन्ना 1:12–13
सच्ची संगति के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि परमेश्वर कौन हैं। मुझे यह भी जानना है कि परमेश्वर ने मुझे अपने साथ किस सम्बन्ध में बुलाया है।
परमेश्वर ने आरम्भ में मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता में बनाया (उत्पत्ति 1:26–27)। यीशु मसीह में उन्होंने हमें अपनी सन्तान होने का स्थान दिया (यूहन्ना 1:12)।
इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर बन गया या परमेश्वर के बराबर हो गया। परमेश्वर सृष्टिकर्ता हैं और हम उनकी सृष्टि हैं। परन्तु यीशु मसीह में परमेश्वर ने हमें अपने निकट आने और पिता और सन्तान के सम्बन्ध में उनके साथ रहने का स्थान दिया है।
यदि मैं अपने आपको केवल पापी और परमेश्वर को केवल न्याय करने वाले न्यायी के रूप में देखता रहूँ, तो मैं उस पिता-सन्तान की संगति की पूर्णता को नहीं जी पाऊँगा जिसमें परमेश्वर ने मुझे मसीह में बुलाया है।
इसलिए दो प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हैं:
परमेश्वर कौन हैं? — सम्मान
यीशु मसीह में मैं उनके साथ किस सम्बन्ध में हूँ? — समानता
हम परमेश्वर को परमप्रधान जानकर उनका सम्मान करते हैं और यीशु मसीह में अपने आपको उनकी सन्तान जानकर उनके निकट आते हैं।
मुख्य विचार:
समानता का अर्थ परमेश्वर के बराबर होना नहीं, बल्कि यीशु मसीह में परमेश्वर द्वारा दिए गए सम्बन्ध और गरिमा में उनके निकट रहना है।
सम्बन्धित पद: उत्पत्ति 1:26–27; यूहन्ना 1:12–13; रोमियों 8:14–17; गलातियों 4:4–7; इब्रानियों 4:16
4. सहभागिता — परमेश्वर की इच्छा और कार्य में सहभागी होना
उत्पत्ति 1:26–28; मत्ती 28:18–20
सच्ची संगति का अर्थ केवल एक-दूसरे के साथ बैठना और बातें करना नहीं है। संगति में हम सामने वाले के जीवन, इच्छा और कार्य में सहभागी होते हैं।
इसलिए परमेश्वर के साथ सच्ची संगति का अगला प्रश्न है:
“परमेश्वर क्या चाहते हैं, और उन्होंने मुझे किस कार्य में सहभागी होने के लिए बुलाया है?”
उत्पत्ति में परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया और पृथ्वी पर अधिकार रखने की जिम्मेदारी दी। मनुष्य को परमेश्वर के उद्देश्य में सहभागी बनाया गया।
इसी बात को हम यीशु मसीह के महान आदेश में एक नए और स्पष्ट रूप में देखते हैं। यीशु ने अपने चेलों को संसार में भेजकर सब जातियों को चेला बनाने की जिम्मेदारी दी।
इसलिए परमेश्वर के साथ संगति का अर्थ केवल उनकी उपस्थिति का आनन्द लेना नहीं है। हम उनके हृदय को जानते हैं, उनकी इच्छा को चाहते हैं और उनके कार्य में सहभागी होते हैं।
सहभागिता का अर्थ है:
परमेश्वर जो चाहते हैं, उसे चाहना।
परमेश्वर जो कर रहे हैं, उसमें सहभागी होना।
परमेश्वर ने जो जिम्मेदारी दी है, उसे उनके साथ मिलकर पूरा करना।
मुख्य विचार:
सच्ची संगति हमें परमेश्वर की इच्छा और उनके कार्य में सहभागी बनाती है।
सम्बन्धित पद: उत्पत्ति 1:26–28; यूहन्ना 15:15–16; 1 कुरिन्थियों 3:9; मत्ती 28:18–20
चार विशेषताओं का सार
समृद्धि — परमेश्वर की संगति से मिला जीवन मेरे द्वारा आगे बढ़ता है।
सम्मान — मैं जानता हूँ कि परमेश्वर कौन हैं।
समानता — मैं जानता हूँ कि यीशु मसीह में परमेश्वर ने मुझे अपने साथ किस सम्बन्ध में बुलाया है।
सहभागिता — मैं परमेश्वर की इच्छा और उनके कार्य में सहभागी होता हूँ।
इस प्रकार सच्ची संगति केवल परमेश्वर के पास आने का नाम नहीं है।
हम परमेश्वर को जानते हैं,
उनके साथ अपने सम्बन्ध को जानते हैं,
उनकी इच्छा में सहभागी होते हैं,
और उनसे मिला जीवन हमारे द्वारा आगे बढ़ता है।
यही सच्ची संगति है।
विचार के लिए प्रश्न
- मैं परमेश्वर को मुख्य रूप से किस रूप में देखता हूँ—दूर बैठे न्यायी के रूप में या यीशु मसीह में मुझे अपने निकट बुलाने वाले पिता के रूप में?
- क्या मैं केवल परमेश्वर से आशीष पाना चाहता हूँ, या उनकी इच्छा और कार्य में सहभागी भी होना चाहता हूँ?
- परमेश्वर से मिला जीवन, प्रेम और भलाई आज मेरे द्वारा किसके जीवन तक पहुँच रही है?