Saturday, 19 September 2026

हमारे परमेश्वर संगति के परमेश्वर है।

 

मुख्य विषय: परमेश्वर ने मनुष्य को अपने साथ सच्ची संगति में रहने के लिए बनाया।

मुख्य पद: उत्पत्ति 1:26–28; यूहन्ना 1:12; 1 यूहन्ना 1:3; मत्ती 28:18–20

परमेश्वर ने मनुष्य को केवल सृष्टि के एक प्राणी के रूप में नहीं बनाया। उन्होंने मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता में बनाया और अपने साथ संगति में रहने के लिए बुलाया। पाप के कारण यह संगति टूट गई, परन्तु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर ने हमें फिर से अपने निकट बुलाया और अपनी सन्तान होने का स्थान दिया।

इसलिए सच्ची संगति को समझने के लिए हमें चार महत्वपूर्ण विशेषताओं को समझना चाहिए—समृद्धि, सम्मान, समानता और सहभागिता।

1. समृद्धि — सच्ची संगति जीवन को बढ़ाती है

उत्पत्ति 1:27–28

परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया और उसे आशीष देकर कहा कि फूलो-फलो, पृथ्वी में भर जाओ और उस पर अधिकार रखो।

इस आज्ञा में हम परमेश्वर के मन को देखते हैं। परमेश्वर की इच्छा केवल यह नहीं थी कि आदम और हव्वा उनके साथ अकेले संगति में रहें। उन्होंने उन्हें आशीष दी कि उनका जीवन फले-फूले, बढ़े और पृथ्वी में भर जाए।

इसलिए समृद्धि का अर्थ केवल धन या भौतिक सम्पन्नता नहीं है। यहाँ समृद्धि का अर्थ है कि परमेश्वर से प्राप्त जीवन, प्रेम और भलाई हमारे भीतर बन्द न रहें, बल्कि हमारे द्वारा आगे बढ़ें और दूसरों तक पहुँचें।

सच्ची संगति बन्द संगति नहीं है। उसमें जीवन है, और जहाँ जीवन है वहाँ फल और बढ़ोतरी होती है।

मुख्य विचार:
परमेश्वर के साथ सच्ची संगति हमें जीवन देती है, और वह जीवन हमारे द्वारा आगे बढ़ता है।

सम्बन्धित पद: उत्पत्ति 1:27–28; यूहन्ना 15:4–5, 8, 16


2. सम्मान — परमेश्वर कौन हैं?

भजन संहिता 97:9; यशायाह 6:1–5

सच्ची संगति के लिए सामने वाले को सही रूप में पहचानना आवश्यक है।

सम्मान का अर्थ है—यह जानना कि मेरे सामने कौन है, और उसके अनुसार उसके साथ व्यवहार करना।

इसलिए परमेश्वर के साथ सच्ची संगति का पहला प्रश्न है:

“परमेश्वर कौन हैं?”

परमेश्वर परमप्रधान हैं। वे सृष्टिकर्ता हैं, प्रभु हैं और सब कुछ उन्हीं से है। इसलिए हम परमेश्वर को अपनी इच्छा के अनुसार छोटा बनाकर उनके साथ संगति नहीं कर सकते। हमें उन्हें वैसे ही जानना है जैसे वे वास्तव में हैं।

परमेश्वर हमारे पिता हैं, परन्तु वे फिर भी परमप्रधान परमेश्वर हैं। इसलिए उनके साथ निकटता उनके प्रति सम्मान को समाप्त नहीं करती।

मुख्य विचार:
सम्मान का अर्थ है परमेश्वर को सही रूप में जानना और उनके अनुसार उनके साथ व्यवहार करना।

सम्बन्धित पद: भजन संहिता 97:9; यशायाह 6:1–5; इब्रानियों 12:28


3. समानता — यीशु मसीह में मुझे किस सम्बन्ध में बुलाया गया है?

यूहन्ना 1:12–13

सच्ची संगति के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि परमेश्वर कौन हैं। मुझे यह भी जानना है कि परमेश्वर ने मुझे अपने साथ किस सम्बन्ध में बुलाया है।

परमेश्वर ने आरम्भ में मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता में बनाया (उत्पत्ति 1:26–27)। यीशु मसीह में उन्होंने हमें अपनी सन्तान होने का स्थान दिया (यूहन्ना 1:12)।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर बन गया या परमेश्वर के बराबर हो गया। परमेश्वर सृष्टिकर्ता हैं और हम उनकी सृष्टि हैं। परन्तु यीशु मसीह में परमेश्वर ने हमें अपने निकट आने और पिता और सन्तान के सम्बन्ध में उनके साथ रहने का स्थान दिया है।

यदि मैं अपने आपको केवल पापी और परमेश्वर को केवल न्याय करने वाले न्यायी के रूप में देखता रहूँ, तो मैं उस पिता-सन्तान की संगति की पूर्णता को नहीं जी पाऊँगा जिसमें परमेश्वर ने मुझे मसीह में बुलाया है।

इसलिए दो प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हैं:

परमेश्वर कौन हैं? — सम्मान
यीशु मसीह में मैं उनके साथ किस सम्बन्ध में हूँ? — समानता

हम परमेश्वर को परमप्रधान जानकर उनका सम्मान करते हैं और यीशु मसीह में अपने आपको उनकी सन्तान जानकर उनके निकट आते हैं।

मुख्य विचार:
समानता का अर्थ परमेश्वर के बराबर होना नहीं, बल्कि यीशु मसीह में परमेश्वर द्वारा दिए गए सम्बन्ध और गरिमा में उनके निकट रहना है।

सम्बन्धित पद: उत्पत्ति 1:26–27; यूहन्ना 1:12–13; रोमियों 8:14–17; गलातियों 4:4–7; इब्रानियों 4:16


4. सहभागिता — परमेश्वर की इच्छा और कार्य में सहभागी होना

उत्पत्ति 1:26–28; मत्ती 28:18–20

सच्ची संगति का अर्थ केवल एक-दूसरे के साथ बैठना और बातें करना नहीं है। संगति में हम सामने वाले के जीवन, इच्छा और कार्य में सहभागी होते हैं।

इसलिए परमेश्वर के साथ सच्ची संगति का अगला प्रश्न है:

“परमेश्वर क्या चाहते हैं, और उन्होंने मुझे किस कार्य में सहभागी होने के लिए बुलाया है?”

उत्पत्ति में परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया और पृथ्वी पर अधिकार रखने की जिम्मेदारी दी। मनुष्य को परमेश्वर के उद्देश्य में सहभागी बनाया गया।

इसी बात को हम यीशु मसीह के महान आदेश में एक नए और स्पष्ट रूप में देखते हैं। यीशु ने अपने चेलों को संसार में भेजकर सब जातियों को चेला बनाने की जिम्मेदारी दी।

इसलिए परमेश्वर के साथ संगति का अर्थ केवल उनकी उपस्थिति का आनन्द लेना नहीं है। हम उनके हृदय को जानते हैं, उनकी इच्छा को चाहते हैं और उनके कार्य में सहभागी होते हैं।

सहभागिता का अर्थ है:

परमेश्वर जो चाहते हैं, उसे चाहना।
परमेश्वर जो कर रहे हैं, उसमें सहभागी होना।
परमेश्वर ने जो जिम्मेदारी दी है, उसे उनके साथ मिलकर पूरा करना।

मुख्य विचार:
सच्ची संगति हमें परमेश्वर की इच्छा और उनके कार्य में सहभागी बनाती है।

सम्बन्धित पद: उत्पत्ति 1:26–28; यूहन्ना 15:15–16; 1 कुरिन्थियों 3:9; मत्ती 28:18–20


चार विशेषताओं का सार

समृद्धि — परमेश्वर की संगति से मिला जीवन मेरे द्वारा आगे बढ़ता है।

सम्मान — मैं जानता हूँ कि परमेश्वर कौन हैं।

समानता — मैं जानता हूँ कि यीशु मसीह में परमेश्वर ने मुझे अपने साथ किस सम्बन्ध में बुलाया है।

सहभागिता — मैं परमेश्वर की इच्छा और उनके कार्य में सहभागी होता हूँ।

इस प्रकार सच्ची संगति केवल परमेश्वर के पास आने का नाम नहीं है।

हम परमेश्वर को जानते हैं,
उनके साथ अपने सम्बन्ध को जानते हैं,
उनकी इच्छा में सहभागी होते हैं,
और उनसे मिला जीवन हमारे द्वारा आगे बढ़ता है।

यही सच्ची संगति है।

विचार के लिए प्रश्न

  1. मैं परमेश्वर को मुख्य रूप से किस रूप में देखता हूँ—दूर बैठे न्यायी के रूप में या यीशु मसीह में मुझे अपने निकट बुलाने वाले पिता के रूप में?
  2. क्या मैं केवल परमेश्वर से आशीष पाना चाहता हूँ, या उनकी इच्छा और कार्य में सहभागी भी होना चाहता हूँ?
  3. परमेश्वर से मिला जीवन, प्रेम और भलाई आज मेरे द्वारा किसके जीवन तक पहुँच रही है?

जो परमेश्वर ने सौंपा है उसमें विश्वासयोग्य रहें, और जो परमेश्वर का है उसे परमेश्वर पर छोड़ दें

 19 सितम्बर 2026

सभोपदेशक 1:12–18

12 मैं उपदेशक यरूशलेम में इस्राएल का राजा था।

13 मैं ने अपना मन लगाया कि जो कुछ सूर्य के नीचे किया जाता है, उसका भेद बुद्धि से सोच सोचकर मालूम करूँ, यह बड़े दुःख का काम है जो परमेश्वर ने मनुष्यों के लिए ठहराया है कि वे उस में लगें।

14 मैं ने उन सब कामों को देखा जो सूर्य के नीचें किए जाते हैं, देखो, वे सब व्यर्थ और मानो वायु क पकड़ना है।

15 जो टेढ़ा है वह सीधा नहीं हो सकता, और जो है ही नहीं, वह गिना नहीं जा सकता।

16 मैं ने मन में कहा, "देख, जितने यरूशलेम में मुझ से पहले थे, उन सभों से मैं ने बहुत अधिक बुद्धि प्राप्त की है, और मुझ को बहुत बुद्धि और ज्ञान मिल गया है।"

17 मैं ने अपना मन लगाया कि बुद्धि का भेद लूँ और बावलेपन और मूर्खता को भी जान लूँ। मुझे जान पड़ा कि यह भी वायु को पकड़ना है।

18 क्योंकि बहुत बुद्धि के साथ बहुत खेद भी होता है, और जो अपना ज्ञान बढ़ाता है वह अपना दुःख भी बढ़ाता है।

 

मनन — जो परमेश्वर ने सौंपा है उसमें विश्वासयोग्य रहें, और जो परमेश्वर का है उसे परमेश्वर पर छोड़ दें

उपदेशक यरूशलेम में इस्राएल का राजा था। उसके पास ज्ञान, अनुभव, अधिकार और साधन थे। उसने ऊपर-ऊपर से नहीं, बल्कि अपना मन लगाकर “सूर्य के नीचे” होने वाली बातों को बुद्धि से समझने की कोशिश की। लेकिन जितना उसने जाना, उतना ही एक बात साफ़ होती गई—मनुष्य की बुद्धि की भी एक सीमा है, और वह सीमा परमेश्वर ने ठहराई है।

 

मनुष्य की सीमा जानने का अर्थ यह नहीं है कि हम निकम्मे हैं, कुछ नहीं कर सकते, या हमारे पास कोई क्षमता नहीं है। परमेश्वर ने हमें सोचने, सीखने, बनाने, निर्णय लेने, काम करने और जिम्मेदारी निभाने की क्षमता दी है। इसलिए जहाँ तक परमेश्वर ने हमें अधिकार और जिम्मेदारी दी है, वहाँ हमें अपनी क्षमता को पूरी तरह इस्तेमाल करना चाहिए। आलस्य या गैर-जिम्मेदारी को नम्रता नहीं कहा जा सकता।

 

समस्या तब शुरू होती है जब मनुष्य उस सीमा को पार करना चाहता है जो परमेश्वर ने उसके लिए ठहराई है। उपदेशक ने संसार की हर बात को समझने, समझाने, सीधा करने और अपने हाथ में लेने की कोशिश की। लेकिन उसने कहा, “जो टेढ़ा है वह सीधा नहीं हो सकता, और जो है ही नहीं वह गिना नहीं जा सकता।” कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें मनुष्य सुधार सकता है, लेकिन कुछ बातें ऐसी भी हैं जिन्हें पूरी तरह नियंत्रित करना मनुष्य के हाथ में नहीं है। बीता हुआ समय, हर परिणाम, दूसरे मनुष्य का मन, पूरा भविष्य, मृत्यु और जीवन का अंतिम अर्थ—ये सब मनुष्य के अधिकार में नहीं हैं।

 

इसीलिए सभोपदेशक में जो “व्यर्थ” कहा गया है, उसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर द्वारा दिया गया जीवन और हमारा सारा परिश्रम बेकार है। परिवार की देखभाल करना, मेहनत करना, सीखना, प्रेम करना, सेवा करना और अपनी जिम्मेदारी निभाना व्यर्थ नहीं है। व्यर्थता तब आती है जब मनुष्य यह सोचता है कि वह अपनी सीमा से बाहर जाकर सब कुछ समझ सकता है, सब कुछ पूरा कर सकता है और सब कुछ अपने नियंत्रण में रख सकता है।

जो परमेश्वर ने हमें सौंपा है, वह विश्वासयोग्यता का क्षेत्र है; और जो केवल परमेश्वर का है, उसे अपने हाथ में लेने की कोशिश करना व्यर्थता की ओर ले जाता है।

 

उपदेशक ने बहुत ज्ञान और बुद्धि प्राप्त की, लेकिन उसने यह भी पाया कि ज्ञान बढ़ने के साथ दुःख भी बढ़ता है। कारण यह है कि जितना हम जानते हैं, उतनी ही दुनिया की टूटन, अन्याय, कमजोरियाँ और समस्याएँ हमें अधिक दिखाई देती हैं। लेकिन हर समस्या को देखने की क्षमता मिल जाने का अर्थ यह नहीं कि हमें हर समस्या को ठीक करने की शक्ति भी मिल गई है। जानना और नियंत्रित कर पाना एक ही बात नहीं है।

 

सच्ची बुद्धि अपनी क्षमता को छोड़ देना नहीं है। सच्ची बुद्धि यह पहचानना है कि परमेश्वर ने मुझे क्या करने के लिए दिया है, और उसे पूरे मन से करना है। साथ ही, जो बात परमेश्वर ने मेरे हाथ में नहीं दी, वहाँ अपने आप को ज़बरदस्ती मालिक बनाने के बजाय परमेश्वर पर पूरी तरह निर्भर रहना है।

 

परमेश्वर पर निर्भर रहने वाला व्यक्ति कमजोर या निष्क्रिय नहीं होता। वह जानता है कि उसकी क्षमता कहाँ से आई है और उसे कहाँ तक उपयोग करना है। वह यह नहीं कहता, “मैं कुछ नहीं कर सकता।” बल्कि वह कहता है, “जो परमेश्वर ने मुझे सौंपा है, उसे मैं विश्वासयोग्यता से करूँगा; लेकिन जो केवल परमेश्वर का काम है, उसे मैं परमेश्वर पर छोड़ दूँगा।”

 

हमारी बहुत-सी चिन्ता भी तब शुरू होती है जब यह सीमा टूट जाती है। हम आज की जिम्मेदारी तो निभाते हैं, लेकिन कल के परिणामों को भी आज ही अपने हाथ में लेना चाहते हैं। हम योजना बना सकते हैं, लेकिन भविष्य के मालिक नहीं बन सकते। हम प्रेम कर सकते हैं, लेकिन दूसरे के मन को नियंत्रित नहीं कर सकते। हम बीज बो सकते हैं, लेकिन फल को अपनी शक्ति से पैदा नहीं कर सकते।

 

इसलिए अपनी सीमा जानना जीवन से भागना नहीं है। यह अपनी जिम्मेदारी और परमेश्वर की प्रभुता के बीच सही भेद जानना है।

जो अपनी सीमा जानता है, वह अपनी क्षमता को छोड़ता नहीं है। जो उसे सौंपा गया है, उसे पूरी निष्ठा से करता है; और जो उसे नहीं सौंपा गया, उसे परमेश्वर पर छोड़ देता है।

 

अन्ततः

सभोपदेशक 1:12–18 यह नहीं कहता कि मनुष्य की बुद्धि और मेहनत स्वयं व्यर्थ हैं। यह हमें दिखाता है कि जब मनुष्य परमेश्वर द्वारा ठहराई गई सीमा को पार करके सब कुछ समझने, पूरा करने और नियंत्रित करने की कोशिश करता है, तब वह व्यर्थता का अनुभव करता है। सच्ची बुद्धि यह है कि जहाँ परमेश्वर ने हमें जिम्मेदारी दी है वहाँ हम अपनी पूरी क्षमता से विश्वासयोग्य रहें, और जहाँ बात केवल परमेश्वर के अधिकार की है वहाँ उस पर पूरी तरह निर्भर रहें।

 

मनन के प्रश्न

  1. क्या मैं उस जिम्मेदारी से भाग रहा हूँ जिसे परमेश्वर ने मुझे सौंपा है, यह कहकर कि “मैं नहीं कर सकता”?
  2. क्या मैं उन परिणामों और भविष्य को भी नियंत्रित करना चाहता हूँ जो केवल परमेश्वर के हाथ में हैं?
  3. आज कौन-सी बात मुझे पूरी निष्ठा से करनी है, और कौन-सी बात परमेश्वर पर छोड़नी है?

 

प्रार्थना

हे परमेश्वर, मुझे यह समझने की बुद्धि दीजिए कि आपने मुझे क्या सौंपा है और क्या अपने हाथ में रखा है। जो जिम्मेदारी आपने मुझे दी है उसे विश्वासयोग्यता से निभाने की शक्ति दीजिए, और जिन बातों पर मेरा अधिकार नहीं है उन्हें पूरी तरह आपके हाथ में सौंपना सिखाइए। आमी


Wednesday, 16 September 2026

आपका जीवन ही आपकी गवाही बने

 17 सितम्बर 2026

नीतिवचन 31:23–31 पर

23 जब उसका पति सभामें देश के पुरनियों के संग बैठता है, तब उसका सम्मान होता है।

24 वह सन के वस्त्र बनाकर बेचती है; और व्यापारी को कमरबन्द देती है।

25 वह बल और प्रताप का पहिरावा पहिने रहती है, और आनेवाले काल पर हँसती है।

26 वह बुद्धि की बात बोलती है, और उसके वचन कृपा की शिक्षा के अनुसार होते हैं।

27 वह अपने घराने के चालचलन को ध्यान से देखती है, और अपनी रोटी बिना परिश्रम नहीं खाती।

28 उसके पुत्र उठ उठकर उसको धन्य कहते हैं; उसका पति भी उठकर उसकी ऐसी प्रशंसा करता है:

29 “बहुत सी स्त्रियों ने अच्छे अच्छे काम तो किए हैं परन्तु तू उन सभों में श्रेष्‍ठ है।”

30 शोभा तो झूठी और सुन्दरता व्यर्थहै, परन्तु जो स्त्री यहोवा का भय मानती है, उसकी प्रशंसा की जाएगी।

31 उसके हाथों के परिश्रम का फल उसे दो, और उसके कार्यों से सभा में उसकी प्रशंसा होगी।

 

मनन-

आपका जीवन ही आपकी गवाही बने

नीतिवचन 31 की यह स्त्री अपने बारे में बोलने से अधिक अपने जीवन से बोलती है। परमेश्वर ने उसे जो परिवार, काम और जिम्मेदारियाँ दी हैं, वह उन्हें भरोसेमंद रीति से निभाती है। इसी कारण उसका प्रभाव केवल उसके अपने जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके पति, बच्चों, घर और समाज तक पहुँचता है। जब कोई व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी विश्वासयोग्यता से निभाता है, तो उसके आसपास के लोगों को भी अपने स्थान पर स्थिर होकर जीने में सहायता मिलती है।

 

24 पद में वह अपने हाथों से वस्त्र बनाती है और उन्हें बेचती भी है। यहाँ बुद्धि केवल बचाने या खर्च करने की बात नहीं करती; बुद्धि परमेश्वर से मिली चीज़ों को फलदायक बनाती है। यही बात अनुग्रह पर भी लागू होती है। जो प्रेम हमें मिला है, वह आगे प्रेम बने; जो सान्त्वना हमें मिली है, वह किसी और के लिए सान्त्वना बने; जो बुद्धि मिली है, वह किसी और को खड़ा करे। इस तरह परमेश्वर का अनुग्रह हमारे पास आकर रुकने के लिए नहीं है। अनुग्रह पाने वाला व्यक्ति अनुग्रह का अन्त नहीं, बल्कि दूसरों के लिए अनुग्रह का द्वार बनता है।

 

25 पद कहता है कि वह सामर्थ्य और प्रतिष्ठा का वस्त्र पहने रहती है और आने वाले समय पर हँसती है। वह इसलिए निश्चिन्त नहीं है कि उसे भविष्य की सारी बातें पता हैं, बल्कि इसलिए कि वह आज की जिम्मेदारी को ठीक से निभाती है। वह भविष्य को अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं करती; वह आज परमेश्वर पर भरोसा करके जीती है। जब हम परमेश्वर द्वारा दिए गए आज में सन्तुष्ट होकर आज की जिम्मेदारी को विश्वासयोग्यता से निभाते हैं, तब भविष्य का भय हम पर रा नहीं सकता

 

26 पद में उसके मुँह का उल्लेख आता है। उसके शब्दों में बुद्धि है और उसकी वाणी में कृपा और प्रेम की शिक्षा है। पहले उसके हाथों ने काम किया, अब उसके शब्द दूसरों को सम्भालते और खड़ा करते हैं। सच्ची बुद्धि केवल मेहनत में नहीं, बोलने के ढंग में भी दिखाई देती है। प्रेम का अर्थ यह नहीं कि मैं अपने मन की हर बात कह दूँ; प्रेम यह है कि सामने वाले के लिए जो आवश्यक है, उसे उचित और प्रेमपूर्ण रीति से कहा जाए।

 

27 पद बताता है कि वह अपने घर की दशा पर ध्यान रखती है। देखभाल केवल कामों की संख्या से नहीं मापी जाती। सच्ची देखभाल में यह जानना भी शामिल है कि किसे सहायता चाहिए, कहाँ कमी है और किस बात की तैयारी आवश्यक है। परमेश्वर ने जिन लोगों को हमारे जीवन से जोड़ा है, उनकी स्थिति को समझना भी हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

 

28–29 पद में उसके बच्चे और उसका पति उसकी प्रशंसा करते हैं। वह स्वयं अपने कामों का प्रचार नहीं करती। उसके जीवन की लगातार विश्वासयोग्यता ही उसके लिए बोलती है। सच्ची प्रतिष्ठा अपने आपको सिद्ध करने से नहीं आती; वह ऐसे जीवन से आती है जिसे देखकर दूसरे लोग उसके फल को पहचानते हैं।

 

30 पद इस पूरे भाग की जड़ दिखाता है। यहोवा का भय मानने वाली स्त्री प्रशंसा पाएगी। इसका अर्थ यह है कि सुयोग्यता का मूल केवल मेहनत, कौशल या समझदारी नहीं है। उसकी गहरी जड़ है—यहोवा का भय मानना, परमेश्वर को सर्वोच्च मानना और अपने आपको उस पर आश्रित जानना। जब मनुष्य परमेश्वर के सामने अपनी सही जगह स्वीकार करता है, तभी वह समय, धन, परिवार, काम और अन्य जिम्मेदारियों का सही उपयोग कर सकता है।

 

31 पद में कहा गया है कि उसके हाथों का फल उसे मिले और उसके काम नगर के फाटकों में उसकी प्रशंसा करें। बुद्धिमान व्यक्ति अपनी पहचान साबित करने में नहीं लगा रहता। वह परमेश्वर द्वारा दिए गए स्थान पर विश्वासयोग्यता से चलता है। फिर समय के साथ उसका जीवन स्वयं उसकी गवाही बन जाता है।

 

अन्ततः

नीतिवचन 31:23–31 यह दिखाता है कि यहोवा का भय मानने वाला व्यक्ति जब परमेश्वर द्वारा सौंपे गए जीवन को विश्वासयोग्यता से जीता है, तो उसका जीवन परिवार और समाज के लिए आशीष का कारण बनता है। वह मिले हुए अनुग्रह को अपने तक नहीं रोकता, भविष्य के भय उसके ऊपर राज नहीं होता, और अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता। उसका जीवन और उसके कार्यों का फल उसके बारे में बोलते हैं।

 

मनन के प्रश्न

  1. क्या परमेश्वर से मिला अनुग्रह मेरे पास रुक जाता है, या मेरे द्वारा दूसरों तक पहुँचता है?
  2. क्या मैं आने वाले कल के भय में जी रहा हूँ, या परमेश्वर द्वारा दिए गए आज को विश्वासयोग्यता से निभा रहा हूँ?
  3. क्या मैं अपने आपको सिद्ध करने में लगा हूँ, या मेरा जीवन और उसका फल मेरी गवाही बन रहा है?

 

प्रार्थना

हे परमेश्वर, मुझे आज के दिन को विश्वासयोग्यता से जीना सिखाइए। आपने जो परिवार, लोग, काम और जिम्मेदारियाँ मुझे दी हैं, उन्हें बुद्धि, प्रेम और सत्य के साथ निभाने में मेरी सहायता कीजिए।

आपका अनुग्रह मेरे भीतर रुक न जाए, बल्कि मेरे द्वारा दूसरों तक पहुँचे। मेरा जीवन ऐसा हो कि मेरे शब्दों से अधिक मेरे काम और मेरे जीवन का फल आपकी महिमा प्रकट करे। आमीन।


Tuesday, 15 September 2026

सुयोग्य जीवन की शुरुआत विश्वास से होती है

 16 सितम्बर 2026

नीतिवचन 31:10–22

10 भली पत्नी कौन पा सकता है? क्योंकि उसका मूल्य मूँगों से भी बहुत अधिक है।

11 उसके पति के मन में उसके प्रति विश्‍वास है, और उसे लाभ की घटी नहीं होती।

12 वह अपने जीवन के सारे दिनों में उस से बुरा नहीं, वरन् भला ही व्यवहार करती है।

13 वह ऊन और सन ढूँढ़ ढूँढ़कर, अपने हाथों से प्रसन्नता के साथ काम करती है।

14 वह व्यापार के जहाजों के समान, अपनी भोजनवस्तुएँ दूर से मँगवाती है।

15 वह रात ही को उठ बैठती है, और अपने घराने को भोजन खिलाती है, और अपनी दासियों को अलग अलग काम देती है।

16 वह किसी खेत के विषय में सोच विचार करती है और उसे मोल ले लेती है; और अपने परिश्रम के फल से दाख की बारी लगाती है।

17 वह अपनी कटि को बल के फेंटे से कसती है, और अपनी बाँहों को दृढ़ बनाती है।

18 वह परख लेती है कि मेरा व्यापार लाभदायक है। रात को उसका दिया नहीं बुझता।

19 वह अटेरन में हाथ लगाती है, और चरखा पकड़ती है।

20 वह दीन के लिये मुट्ठी खोलती है, और दरिद्र को संभालने के लिए हाथ बढ़ाती है।

21 वह अपने घराने के लिये हिम से नहीं डरती, क्योंकि उसके घर के सब लोग लाल कपड़े पहिनते हैं।

22 वह तकिये बना लेती है; उसके वस्त्र सूक्ष्म सन और बैंजनी रंग के होते हैं।”

 

मनन-सुयोग्य जीवन की शुरुआत विश्वास से होती है

नीतिवचन 31:10–22 को अक्सर “सुयोग्य स्त्री” के विषय में पढ़ा जाता है। लेकिन यहाँ सुयोग्यता का अर्थ केवल अच्छा स्वभाव या बहुत मेहनत करना नहीं है। इसका अर्थ है ऐसा जीवन जिसमें परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों को निभाने की बुद्धि, क्षमता, चरित्र और जिम्मेदारी हो। इसलिए सुयोग्यता का अर्थ है परमेश्वर द्वारा दी गई जीवन-भूमिका और सेवा को सही रीति से निभाना।

लेकिन इसकी शुरुआत क्षमता से पहले विश्वास से होती है। 11वाँ पद कहता है कि उसके पति का हृदय उस पर भरोसा करता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। हम अक्सर सोचते हैं, “मैंने परिवार के लिए कितना किया,” लेकिन इससे भी गहरा प्रश्न है, “क्या मेरा परिवार मुझ पर भरोसा कर सकता है?” बहुत काम करना पर्याप्त नहीं है, यदि वचन बार-बार टूटते हों, पैसे का उपयोग साफ़ न हो, बात बदलती रहती हो और जिम्मेदारियाँ पूरी न की जाएँ।

विश्वास एक दिन में नहीं बनता। छोटे वचन निभाने से, पैसे को ईमानदारी से उपयोग करने से, बात और काम में एकता रखने से, जिम्मेदारियों को लगातार निभाने से और गलती होने पर बहाना बनाने के बजाय स्वीकार करने से विश्वास बनता है। जब ये छोटी बातें बार-बार दिखाई देती हैं, तब लोग मन में कहते हैं, “यह व्यक्ति भरोसे के योग्य है।” इसलिए सुयोग्यता का पहला फल विश्वास है।

13–15वें पद में यह स्त्री अपने हाथों से काम करती है, परिवार की आवश्यकता को देखती है और पहले से तैयारी करती है। यहाँ बुद्धि का अर्थ केवल मेहनत करना नहीं है, बल्कि सौंपे गए लोगों की जरूरत को पहले से देखकर तैयारी करना है। बुद्धिमान व्यक्ति समस्या आने के बाद ही नहीं चलता, वह आज की जिम्मेदारी को आज पूरा करता है। भविष्य की चिन्ता और भविष्य की तैयारी अलग बातें हैं। चिन्ता कल का भार आज उठाती है, लेकिन तैयारी आज की जिम्मेदारी को विश्वासयोग्यता से निभाती है।

16वें पद में वह खेत को देखकर खरीदती है और अपने हाथ की कमाई से दाख की बारी लगाती है। वह बिना सोचे निर्णय नहीं करती। वह पहले देखती है, समझती है, फिर निर्णय करती है। इसलिए सुयोग्यता में विवेक आवश्यक है। परमेश्वर द्वारा दिए गए समय, धन और प्रतिभा को कहीं भी खर्च कर देना बुद्धि नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति सोचता है कि क्या आवश्यक है, क्या लाभदायक है और क्या परमेश्वर द्वारा सौंपी गई वस्तुओं का सही उपयोग है।

17–19वें पद में उसकी शक्ति और उसके हाथ बार-बार दिखाई देते हैं। उसकी बुद्धि केवल सोच में नहीं रहती, वह उसके काम में दिखाई देती है। बाइबल की बुद्धि केवल यह नहीं पूछती कि हम कितना जानते हैं, बल्कि यह भी पूछती है कि जो जानते हैं वह हमारे हाथों और जीवन में कैसे दिखाई देता है। परमेश्वर द्वारा सौंपे गए काम को मूल्यवान समझकर विश्वासयोग्यता से करना भी बुद्धि है।

20वें पद में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। पहले उसके हाथ परिवार के लिए काम कर रहे थे, अब वही हाथ दुखी और गरीब लोगों की ओर बढ़ते हैं। इसका अर्थ है कि उसका परिश्रम केवल अपने घर को सम्पन्न बनाने के लिए नहीं है। परमेश्वर ने जो फल दिया है, वह दूसरों तक भी जाता है। इसलिए बुद्धिमान जीवन वह है जो सौंपे गए काम को अच्छी तरह सम्भालता है और फिर उसका फल दूसरों तक पहुँचाता है।

यह हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाता है:

महत्वपूर्ण केवल यह नहीं कि मेरे पास क्या है, बल्कि यह भी है कि जो मेरे पास है वह किस दिशा में जा रहा है।

21–22वें पद में यह स्त्री कठिन समय के लिए पहले से तैयार रहती है, इसलिए डर में नहीं जीती। विश्वास का अर्थ तैयारी न करना नहीं है। यह कहना कि “परमेश्वर सब कर देंगे” और अपनी जिम्मेदारी छोड़ देना विश्वास नहीं है। परमेश्वर पर भरोसा करने का अर्थ है कि हम उनकी दी हुई जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाएँ। इसलिए तैयारी विश्वास की विरोधी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने वाली बुद्धि है।

22वाँ पद यह भी दिखाता है कि वह अपने लिए भी वस्त्र तैयार करती है। यह भी महत्वपूर्ण है। दूसरों की देखभाल करते-करते स्वयं को पूरी तरह थका देना बुद्धि नहीं है। मैं स्वयं भी परमेश्वर द्वारा मुझे सौंपा गया एक जीवन हूँ। परिवार की सेवा करना, दूसरों की सहायता करना और जिम्मेदारियाँ निभाना महत्वपूर्ण है, लेकिन अपने शरीर, मन और जीवन की देखभाल भी जिम्मेदारी है।

अन्ततः नीतिवचन 31:10–22 की सुयोग्य स्त्री केवल बहुत काम करने वाली स्त्री नहीं है। वह परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिंदगी को बुद्धिमानी से सँभालती है, उसके साथ रहने वाले लोग उस पर भरोसा कर सकते हैं, वह जरूरतों को पहले से देखती है, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करती है और जो फल उसे मिला है उसे दूसरों तक पहुँचाती है।

इसीलिए हम कह सकते हैं:

सुयोग्यता वह बुद्धि और क्षमता है जिसके द्वारा हम परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिंदगी और सेवा को निभाते हैं, और उसकी शुरुआत विश्वास से होती है।

अन्ततः

नीतिवचन 31:10–22 दिखाता है कि सुयोग्यता केवल मेहनत नहीं है, बल्कि परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिंदगी, लोगों और संसाधनों को बुद्धिमानी से सँभालने की क्षमता है। इसकी शुरुआत विश्वास से होती है, और विश्वास बड़े काम से नहीं, बल्कि छोटे वचनों, ईमानदार बातों, सही आर्थिक व्यवहार और लगातार निभाई गई जिम्मेदारियों से बनता है।

सुयोग्यता वह बुद्धि और क्षमता है जिसके द्वारा हम परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिंदगी और सेवा को निभाते हैं, और उसकी शुरुआत विश्वास से होती है।

मनन के प्रश्न

  1. क्या मैं यह पूछता हूँ कि मैंने परिवार के लिए कितना किया, या यह कि मेरा परिवार मुझ पर भरोसा कर सकता है?
  2. क्या मेरे छोटे वचन, पैसे का उपयोग, मेरी ईमानदार बातें और जिम्मेदारी निभाने का तरीका लोगों का विश्वास बढ़ा रहे हैं?
  3. परमेश्वर ने जो फल मेरे जीवन और सेवा में दिया है, क्या वह केवल मेरे और मेरे परिवार तक सीमित है, या दूसरों तक भी पहुँच रहा है?

प्रार्थना

हे परमेश्वर, आपने जो जीवन और सेवा मुझे सौंपी है, उसे बुद्धि और विश्वासयोग्यता से निभाने में मेरी सहायता कीजिए। छोटे वचनों, ईमानदार बातों और जिम्मेदार जीवन के द्वारा मुझे भरोसे के योग्य व्यक्ति बनाइए, और आपने जो फल दिया है उसे दूसरों तक पहुँचाने वाला जीवन दीजिए। आमीन।