Wednesday, 23 September 2026

आज को परमेश्वर की देन समझकर जीना

 

    24 सितम्बर 2026

    सभोपदेशक 3:12–22

    1. मैं ने जान लिया है, कि मनुष्यों के लिए आनन्द करने और जीवन भर भलाई करने के सिवाय, और कुछ भी अच्छा नहीं,
    2. और यह भी परमेश्वर का दान है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे।
    3. मैं जानता हूँ कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह सदा स्थिर रहेगा, न तो उसमें कुछ बढ़ाया जा सकता है और न कुछ घटाया  जा सकता है, परमेश्वर ऐसा इसलिए करता है कि लोग उसका भय मानें।
    4. जो कुछ हुआ वह इससे पहले भी हो चुका, जो होनेवाला है, वह हो भी चुका है, और परमेश्वर बीती हुई बात को फिर पूछता है।
    5. फिर मैं ने संसार में क्या देखा कि न्याय के स्थान में दुष्टता होती है, और धर्म के स्थान में भी दुष्टता होती है।
    6. मैं ने मन में कहा, "परमेश्वर धर्मी और दुष्ट दोनों का न्याय करेगा" क्योंकि उसके यहाँ एक एक विषय और एक एक काम का समय है।
    7. मैं ने मन में कहा, "यह इसलिए होता है कि परमेश्वर मनुष्यों को जाँचे कि वे देख सकें कि वे पशु-समान हैं।"
    8. क्योंकि जैसी मनुष्यों की वैसी ही पशुओं की भी दशा होती है, दोनों की वही दशा होती है, जौसे एक मरता वैसे ही दूसरा भी मरता है। सभों की स्वांस एक सी है, और मनुष्य पशु से कुछ बढ़कर नहीं, सब कुछ व्यर्थ ही है।
    9. सब एक स्थान में जाते हैं, सब मिट्टी से बने हैं, और सब मिट्टी में फिर मिल जाते हैं।
    10. क्या मनुष्यों का प्राण ऊपर की ओर चढ़ता है और पशुओं का प्राण नीचे की ओर जाकर मिट्टी में मिल जाता है? यह कौन जानता है?
    11. अतः मैं ने यह देखा कि इससे अधिक कुछ अच्छा नहीं कि मनुष्य अपने कामों में आनन्दित रहे क्योंकि उसका भाग यही है, कौन उसके पीछे होनेवाली बातों को देखने के लिए उसको लौटा लाएगा?

     

    मनन — आज को परमेश्वर की देन समझकर जीना

    उपदेशक कहता है कि मनुष्य के लिए जीवन भर आनन्द करना और भलाई करना अच्छा है। खाना-पीना और अपने परिश्रम में सुख पाना भी परमेश्वर की देन है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार जीए। इसका अर्थ है कि हम आज के जीवन, भोजन, काम और परिश्रम के फल को अपना अधिकार न मानें, बल्कि परमेश्वर से मिला हुआ उपहार समझकर धन्यवाद के साथ स्वीकार करें।

    सभोपदेशक में आनन्द केवल इसलिए नहीं आता कि हमने अपनी इच्छा की परिस्थिति बना ली है। सच्चा आनन्द तब आता है जब हम परमेश्वर की दी हुई चीज़ों को उसके हाथ से प्राप्त करते हैं। वही भोजन, यदि हम उसे केवल अपनी इच्छा और संतोष पूरा करने का साधन मानें, तो कुछ समय बाद फिर कमी महसूस होगी। लेकिन यदि उसे परमेश्वर की देन समझकर ग्रहण करें, तो वही भोजन धन्यवाद का कारण बन जाता है। उसी प्रकार काम यदि अपने मूल्य को सिद्ध करने का साधन बन जाए, तो वह भारी बोझ बन सकता है; परन्तु यदि उसे परमेश्वर द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानें, तो हम उसे विश्वासयोग्यता से निभा सकते हैं।

    14 पद में उपदेशक कहता है कि परमेश्वर जो कुछ करते हैं वह सदा बना रहता है। मनुष्य उसमें न कुछ बढ़ा सकता है और न कुछ घटा सकता है। मनुष्य के कामों की सीमा है, परन्तु परमेश्वर का काम हमारी समझ और नियंत्रण से बड़ा है। यह जानने वाला व्यक्ति अपनी क्षमता को छोड़ता नहीं है। वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करता है, लेकिन साथ ही यह स्वीकार करता है कि वह परमेश्वर नहीं है। यही परमेश्वर का भय मानने वाला जीवन है।

    लेकिन उपदेशक ने संसार में केवल अच्छी बातें ही नहीं देखीं। 16 पद में वह देखता है कि जहाँ न्याय होना चाहिए वहाँ भी दुष्टता है, और जहाँ धर्म होना चाहिए वहाँ भी दुष्टता है। परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ यह नहीं कि हम संसार के अन्याय को देखकर भी अनदेखा करें। इस संसार में अन्याय है, और कभी-कभी ऐसा लगता है कि दुष्ट व्यक्ति बिना न्याय के बच निकलता है।

    फिर भी उपदेशक कहता है कि परमेश्वर धर्मी और दुष्ट दोनों का न्याय करेंगे। हर काम और हर विषय का परमेश्वर के सामने एक समय है। इसलिए यदि अभी पूरा न्याय दिखाई नहीं देता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर ने न्याय करना छोड़ दिया है। मनुष्य सब बुराई को ठीक नहीं कर सकता, लेकिन परमेश्वर सब कुछ जानते हैं और अपने समय में न्याय करेंगे।

    इस विश्वास का अर्थ यह नहीं कि हम न्याय करने की जिम्मेदारी से भाग जाएँ। जहाँ तक हमारी जिम्मेदारी है, वहाँ हमें धर्म करना है और बुराई से दूर रहना है। लेकिन अन्तिम न्याय को अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जब हम अपनी जिम्मेदारी और परमेश्वर के अन्तिम न्याय के बीच भेद करना सीखते हैं, तब हमारा मन परमेश्वर पर भरोसा करना सीखता है।

    18–21 पद में उपदेशक मनुष्य और पशु दोनों की मृत्यु और मिट्टी में लौटने की बात करता है। चाहे मनुष्य कितना भी बुद्धिमान, धनवान या ऊँचे पद पर क्यों न हो, मृत्यु उसके सामने उसकी सीमा को प्रकट कर देती है। हमारी उपलब्धियाँ हमें जीवन और भविष्य पर पूरा अधिकार नहीं देतीं। मृत्यु हमें याद दिलाती है कि हम सीमित प्राणी हैं।

    उपदेशक यह भी स्वीकार करता है कि मृत्यु के बाद की हर बात को मनुष्य केवल अपनी आँखों और समझ से पूरी तरह नहीं जान सकता। यह निराशा नहीं, बल्कि मनुष्य के ज्ञान की सीमा को स्वीकार करना है। कुछ बातें हमें जानने के लिए दी गई हैं, और कुछ बातें परमेश्वर के हाथ में छोड़नी हैं। सच्ची बुद्धि यह नहीं कि हम हर अनजानी बात का उत्तर बना लें, बल्कि यह है कि जिसे हम नहीं जानते उसे परमेश्वर पर छोड़ सकें।

    इसीलिए 22 पद में उपदेशक फिर से आज के जीवन की ओर लौटता है। मनुष्य अपने काम में आनन्द पाए। भविष्य का पूरा ज्ञान हमारे पास नहीं है, और मृत्यु के बाद की हर बात अभी हमारी आँखों के सामने नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि आज का जीवन व्यर्थ है। बल्कि क्योंकि भविष्य परमेश्वर के हाथ में है, इसलिए हम आज की जिम्मेदारी को विश्वासयोग्यता से निभा सकते हैं।

    भविष्य को पूरी तरह न जानने के कारण आज व्यर्थ नहीं हो जाता; बल्कि भविष्य परमेश्वर के हाथ में है, इसलिए हम आज को विश्वासयोग्यता से जी सकते हैं।

    परमेश्वर ने आज हमें भविष्य को नियंत्रित करने के लिए नहीं दिया है। आज का दिन इसलिए दिया गया है कि हम परमेश्वर का भय मानें, भलाई करें, अपनी जिम्मेदारी पूरी करें और उसकी दी हुई चीज़ों का धन्यवाद के साथ आनन्द लें।

    आज परमेश्वर की देन है, और बुद्धिमान व्यक्ति इस देन में आनन्द करता है, भलाई करता है और परमेश्वर का भय मानकर जीता है।

    अन्ततः

    सभोपदेशक 3:12–22 हमें दिखाता है कि मनुष्य भविष्य, मृत्यु और अन्तिम न्याय को नियंत्रित नहीं कर सकता। फिर भी वह परमेश्वर द्वारा दिए गए आज को आनन्द, भलाई और परमेश्वर के भय में जी सकता है। परमेश्वर का काम हमारी सीमा से बड़ा है, और धर्मी और दुष्ट दोनों का अन्तिम न्याय उसी के हाथ में है।

    मनन के प्रश्न

    1. क्या मैं आज के जीवन और परिश्रम को अपना अधिकार मानता हूँ, या परमेश्वर से मिला हुआ उपहार समझता हूँ?
    2. क्या मैं अपनी जिम्मेदारी और उन परिणामों तथा न्याय को अलग कर पाता हूँ जिन्हें परमेश्वर के हाथ में छोड़ना चाहिए?
    3. आज परमेश्वर द्वारा दिए गए समय में मुझे किस बात का धन्यवाद करना और कौन-सी भलाई करनी है?

    प्रार्थना

    हे परमेश्वर, आज के जीवन को आपकी देन समझकर धन्यवाद के साथ जीना सिखाइए। जो जिम्मेदारी आपने मुझे दी है उसे विश्वासयोग्यता से निभाऊँ, और जिस भविष्य तथा परिणाम को मैं नियंत्रित नहीं कर सकता उसे आपके हाथ में छोड़ दूँ।

    अन्याय के बीच भी आपके न्याय और विश्वासयोग्यता पर भरोसा करते हुए भलाई करने दीजिए, और आज की जिंदगी में आपका भय मानते हुए आनन्दित रहना सिखाइए। आमीन।

     

     

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