Wednesday, 16 September 2026

आपका जीवन ही आपकी गवाही बने

 17 सितम्बर 2026

नीतिवचन 31:23–31 पर

23 जब उसका पति सभामें देश के पुरनियों के संग बैठता है, तब उसका सम्मान होता है।

24 वह सन के वस्त्र बनाकर बेचती है; और व्यापारी को कमरबन्द देती है।

25 वह बल और प्रताप का पहिरावा पहिने रहती है, और आनेवाले काल पर हँसती है।

26 वह बुद्धि की बात बोलती है, और उसके वचन कृपा की शिक्षा के अनुसार होते हैं।

27 वह अपने घराने के चालचलन को ध्यान से देखती है, और अपनी रोटी बिना परिश्रम नहीं खाती।

28 उसके पुत्र उठ उठकर उसको धन्य कहते हैं; उसका पति भी उठकर उसकी ऐसी प्रशंसा करता है:

29 “बहुत सी स्त्रियों ने अच्छे अच्छे काम तो किए हैं परन्तु तू उन सभों में श्रेष्‍ठ है।”

30 शोभा तो झूठी और सुन्दरता व्यर्थहै, परन्तु जो स्त्री यहोवा का भय मानती है, उसकी प्रशंसा की जाएगी।

31 उसके हाथों के परिश्रम का फल उसे दो, और उसके कार्यों से सभा में उसकी प्रशंसा होगी।

 

मनन-

आपका जीवन ही आपकी गवाही बने

नीतिवचन 31 की यह स्त्री अपने बारे में बोलने से अधिक अपने जीवन से बोलती है। परमेश्वर ने उसे जो परिवार, काम और जिम्मेदारियाँ दी हैं, वह उन्हें भरोसेमंद रीति से निभाती है। इसी कारण उसका प्रभाव केवल उसके अपने जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके पति, बच्चों, घर और समाज तक पहुँचता है। जब कोई व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी विश्वासयोग्यता से निभाता है, तो उसके आसपास के लोगों को भी अपने स्थान पर स्थिर होकर जीने में सहायता मिलती है।

 

24 पद में वह अपने हाथों से वस्त्र बनाती है और उन्हें बेचती भी है। यहाँ बुद्धि केवल बचाने या खर्च करने की बात नहीं करती; बुद्धि परमेश्वर से मिली चीज़ों को फलदायक बनाती है। यही बात अनुग्रह पर भी लागू होती है। जो प्रेम हमें मिला है, वह आगे प्रेम बने; जो सान्त्वना हमें मिली है, वह किसी और के लिए सान्त्वना बने; जो बुद्धि मिली है, वह किसी और को खड़ा करे। इस तरह परमेश्वर का अनुग्रह हमारे पास आकर रुकने के लिए नहीं है। अनुग्रह पाने वाला व्यक्ति अनुग्रह का अन्त नहीं, बल्कि दूसरों के लिए अनुग्रह का द्वार बनता है।

 

25 पद कहता है कि वह सामर्थ्य और प्रतिष्ठा का वस्त्र पहने रहती है और आने वाले समय पर हँसती है। वह इसलिए निश्चिन्त नहीं है कि उसे भविष्य की सारी बातें पता हैं, बल्कि इसलिए कि वह आज की जिम्मेदारी को ठीक से निभाती है। वह भविष्य को अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं करती; वह आज परमेश्वर पर भरोसा करके जीती है। जब हम परमेश्वर द्वारा दिए गए आज में सन्तुष्ट होकर आज की जिम्मेदारी को विश्वासयोग्यता से निभाते हैं, तब भविष्य का भय हम पर रा नहीं सकता

 

26 पद में उसके मुँह का उल्लेख आता है। उसके शब्दों में बुद्धि है और उसकी वाणी में कृपा और प्रेम की शिक्षा है। पहले उसके हाथों ने काम किया, अब उसके शब्द दूसरों को सम्भालते और खड़ा करते हैं। सच्ची बुद्धि केवल मेहनत में नहीं, बोलने के ढंग में भी दिखाई देती है। प्रेम का अर्थ यह नहीं कि मैं अपने मन की हर बात कह दूँ; प्रेम यह है कि सामने वाले के लिए जो आवश्यक है, उसे उचित और प्रेमपूर्ण रीति से कहा जाए।

 

27 पद बताता है कि वह अपने घर की दशा पर ध्यान रखती है। देखभाल केवल कामों की संख्या से नहीं मापी जाती। सच्ची देखभाल में यह जानना भी शामिल है कि किसे सहायता चाहिए, कहाँ कमी है और किस बात की तैयारी आवश्यक है। परमेश्वर ने जिन लोगों को हमारे जीवन से जोड़ा है, उनकी स्थिति को समझना भी हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

 

28–29 पद में उसके बच्चे और उसका पति उसकी प्रशंसा करते हैं। वह स्वयं अपने कामों का प्रचार नहीं करती। उसके जीवन की लगातार विश्वासयोग्यता ही उसके लिए बोलती है। सच्ची प्रतिष्ठा अपने आपको सिद्ध करने से नहीं आती; वह ऐसे जीवन से आती है जिसे देखकर दूसरे लोग उसके फल को पहचानते हैं।

 

30 पद इस पूरे भाग की जड़ दिखाता है। यहोवा का भय मानने वाली स्त्री प्रशंसा पाएगी। इसका अर्थ यह है कि सुयोग्यता का मूल केवल मेहनत, कौशल या समझदारी नहीं है। उसकी गहरी जड़ है—यहोवा का भय मानना, परमेश्वर को सर्वोच्च मानना और अपने आपको उस पर आश्रित जानना। जब मनुष्य परमेश्वर के सामने अपनी सही जगह स्वीकार करता है, तभी वह समय, धन, परिवार, काम और अन्य जिम्मेदारियों का सही उपयोग कर सकता है।

 

31 पद में कहा गया है कि उसके हाथों का फल उसे मिले और उसके काम नगर के फाटकों में उसकी प्रशंसा करें। बुद्धिमान व्यक्ति अपनी पहचान साबित करने में नहीं लगा रहता। वह परमेश्वर द्वारा दिए गए स्थान पर विश्वासयोग्यता से चलता है। फिर समय के साथ उसका जीवन स्वयं उसकी गवाही बन जाता है।

 

अन्ततः

नीतिवचन 31:23–31 यह दिखाता है कि यहोवा का भय मानने वाला व्यक्ति जब परमेश्वर द्वारा सौंपे गए जीवन को विश्वासयोग्यता से जीता है, तो उसका जीवन परिवार और समाज के लिए आशीष का कारण बनता है। वह मिले हुए अनुग्रह को अपने तक नहीं रोकता, भविष्य के भय उसके ऊपर राज नहीं होता, और अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं करता। उसका जीवन और उसके कार्यों का फल उसके बारे में बोलते हैं।

 

मनन के प्रश्न

  1. क्या परमेश्वर से मिला अनुग्रह मेरे पास रुक जाता है, या मेरे द्वारा दूसरों तक पहुँचता है?
  2. क्या मैं आने वाले कल के भय में जी रहा हूँ, या परमेश्वर द्वारा दिए गए आज को विश्वासयोग्यता से निभा रहा हूँ?
  3. क्या मैं अपने आपको सिद्ध करने में लगा हूँ, या मेरा जीवन और उसका फल मेरी गवाही बन रहा है?

 

प्रार्थना

हे परमेश्वर, मुझे आज के दिन को विश्वासयोग्यता से जीना सिखाइए। आपने जो परिवार, लोग, काम और जिम्मेदारियाँ मुझे दी हैं, उन्हें बुद्धि, प्रेम और सत्य के साथ निभाने में मेरी सहायता कीजिए।

आपका अनुग्रह मेरे भीतर रुक न जाए, बल्कि मेरे द्वारा दूसरों तक पहुँचे। मेरा जीवन ऐसा हो कि मेरे शब्दों से अधिक मेरे काम और मेरे जीवन का फल आपकी महिमा प्रकट करे। आमीन।


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