Monday, 20 April 2015
उड़ाऊ पुत्र
फिर उस ने कहा,
“किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। उन में से छुटके
ने पिता से कहा,
‘हे पिता, संपत्ति में से
जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए।’
उस ने उन को अपनी संपत्ति बाँट दी। बहुत
दिन न बीते थे कि छोटा पुत्र सब कुछ इकट्ठा करके एक दूर देश को चला गया, और वहाँ कुकर्म
में अपनी संपत्ति उड़ा दी। जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में बड़ा
अकाल पड़ा, और वह कंगाल हो गया। इसलिये वह उस देश के निवासियों
में से एक के यहाँ जा पड़ा। उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा। और
वह चाहता था, कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे, अपना पेट
भरे; और उसे कोई कुछ नहीं देता था। जब वह अपने आपे में आया,
तब कहने लगा,
‘मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक
रोटी मिलती है, और मैं यहाँ भूखा मर रहा हूँ। मैं अब उठकर अपने
पिता के पास जाऊँगा और उससे कहूँगा कि पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी
दृष्टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊँ, मुझे अपने एक मजदूर की समान रख ले। तब वह उठकर, अपने
पिता के पास चला: वह अभी दूर ही था, कि
उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया,
और बहुत चूमा। पुत्र न उस से कहा,
‘पिता जी, मैं ने स्वर्ग
के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है; और अब इस योग्य
नहीं रहा, कि तेरा पुत्र कहलाऊँ।’
‘झट अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहिनाओ,
और उसके हाथ में अंगूठी, और पांवों में जूतियां
पहिनाओ, और पला हुआ बछड़ा लाकर मारो ताकि हम खाँए और आनन्द मनाएँ।
क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है : खो गय था, अब मिल गया है।’
और वे आनन्द करने लगे। परन्तु उसका जेठा
पुत्र खेत में था। जब वह आते हुए घर के निकट पहुँचा, तो उस ने गाने-बजाने और नाचने का शब्द सुना।
अतः उस ने एक दास को बुलाकर पूछा,
‘यह क्या हो रहा है?’
उस ने उस से कहा,
‘तेरा भाई आया है; और तेरे
पिता ने पला हुआ बछड़ा कटवाया है, इसलिये कि उसे भला चँगा पाया
है।’
यह सुनकर वह क्रोध से भर गया, और भीतर जाना न चाहा,
परन्तु उसका पिता बाहर आकर उसे मनाने लगा। उस ने पिता को उत्तर दिया,
‘देख, मैं इतने वर्ष से
तेरी सेवा कर रहा हूँ, और कभी भी तेरी आज्ञा नहीं टाली,
तौभी तू ने मुझे कभी एक बकरी का बच्चा भी न दिया, कि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द करता। परन्तु जब तेरा यह पुत्र, जिस ने तेरी संपत्ति वेश्याओं में उड़ा दी है, आया,
तो उसके लिये तू ने पला हुआ बछड़ा कटवाया।’
उस ने उस से कहा,
‘पुत्र, तू सर्वदा मेरे
साथ है; और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा ही है। परन्तु अब आनन्द
करना और मगन होना चाहिए क्योंकि यह तेरा भाई मर गया था, फिर जी
गया है; खो गया था, अब मिल गया है।’
(लूका 15:11-33)
इस दृष्टांत में दो पुत्र की कहानी
है, जो आज हम उसके रूप को लेकर जी रहे हैं और पिता, परमेश्वर को दर्शाता है।
दो पुत्र के समस्या एक ही है पहला,
वे लोग अपने पहचान को नहीं पहचान पाया है।
वे पिता के पुत्र का स्थान को नहीं जानते थे।
इसलिये अनुज पुत्र पिता से अपने संपत्ति के हिस्सा को माँग कर दूर देश में चला गया
है। जेठा पुत्र भी जब अपने अनुज प्रदेश से घर वापस आने का खुश को पिताजी ने अपने
लोगों के साथ माना रहे थे, उस समय में अनुज की प्रति पिता के प्रेम को न समझकर
क्रोध होकर पिता से बात की, ‘देख, मैं इतने वर्ष से
तेरी सेवा कर रहा हूँ, और कभी भी तेरी आज्ञा नहीं टाली,
तौभी तू ने मुझे कभी एक बकरी का बच्चा भी न दिया, कि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द करता। परन्तु जब तेरा यह पुत्र, जिस ने तेरी संपत्ति वेश्याओं में उड़ा दी है, आया,
तो उसके लिये तू ने पला हुआ बछड़ा कटवाया।’ उसके
बाद पिता जी जेठा पुत्र को समझाते हुए कहा, ‘पुत्र, तू सर्वदा मेरे साथ है; और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा
ही है।’ इस वार्तालब से हम देख सकते है कि जैठा पुत्र भी पिता के यहाँ रहकर भी अपने पहचान
को नहीं जाना। यही इस परिवार का मुखिय समस्या है। एकने अपने पहचान को खोकर दुसरे
जगहों में जाकर धन, दोस्ती, अपने कार्यों के द्वारा अपने पहचान को बनाना चाहा,
दुसरा अपने घर में रहकर भी अपना स्थान जो जेठा पुत्र के स्थान को नहीं संभल दिया है। जब मनुष्यों अपने पहचान को गलत
जगहों, गलत तरीके से बनाने के लिये प्रयास करने से बहुत सारा समस्या खड़ा होता है।
बाइबल बताती है कि मनुष्य परमेश्वर के द्वारा उसके समानता में, स्वरूप में रचाया
गया है और परमेश्वर ने उन्हें आशिष दिया है। उस समय मनुष्य के पास परमेश्वर के
बुद्धि, महिमा, अधिकार और परमश्वर के साथ संगति मनुष्यों के पास था। जैसे अनुज
पुत्र अपने पिता के घर में रहकर पिताजी के द्वारा सासे सुविधा को मिलता था। पर जब
समय आ गया ) उड़ाऊ पुत्र अपने पिता के घर से दूर की देश में गया, कुछ समय तक उसके
लिये सब कुछ ठीक था, पर अपने संपत्ति को कुकर्म से पुरा खत्म करने के बाद जहाँ वह
रहता था उस देश में अकाल पड़ा, वह कंगाल हो गया, रोजगरी नहीं मिलने पार उसकी हलात
और बिगड़ता गया, यहाँ तक की वह सूअर को चराने के लिये भी तैयारी हो गया पर उससे
कुछ होने वाला नहीं था, और उसका हल बिगड़ता हुआ चल गया, सूअर के चारे के द्वारा
अपने भुखको मिटाने के लिये कोशिश किया पर निकम्मा हो गया है।
मनुष्य परमेश्वर के साथ अश्रय जीवन
को छोड़कर अपना अहँकारी जीवन में प्रवेश किया जब से मनुष्यों के परिस्थिति के
संबंध में बाइबल बताती है, “कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं। कोई समझदार
नहीं; कोई परमेश्वर का खोजने वाला नहीं। सब भटक गए हैं, सब
के सब निकम्मे बन गए हैं; कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी
नहीं। उनका गला खुली हुई कब्र है, उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है, उनके होठों
में साँपों का विष है। उनका मुँह श्राप और कड़वाहट से भरा है। उनके पाँव लहू बहाने
को फुर्तीले है, उनके मार्गों में नाश और क्लेश है, उन्होंने कुशल का मार्ग नहीं
जाना। उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं।”(रोम 3:10-18) कोई आशा मनुष्य के पास नहीं बचा।
तब उड़ाऊ पुत्रने अपने पिता के घर
को याद आया, अपने गलतियों को समझने लगे, पश्चाताप करने के बाद और पिता के घर वापस
जाने की निर्णय लिया। हमारे जीवन में भी अलग अलग तरीके से समस्या आते हैं और उस
समस्या को निभाने के लिये जिन्दगी जुट जाता है पर मूल समस्य को नहीं देख पाता है।
वह है खोए हुए पहचान को कैसे वापस कर सकते हैं। जैसे उड़ाऊ पुत्र ने अपने पहचान को
गलत जगहों से गलत तरीके से बनाने के लिये स्वर्ग के विरोध में अपने पिता के विरोध
में पाप किया था और उसके फल स्वरूप खोये हुए पहचान को फिर वापस करने के लिये पिता
के पास वापस जाने का निर्णय लिया तो हम लोग कैसे अपने पहचान को फिर से वापस कर
सकते हैं बाइबल बताते है कि ‘परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने
उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास
रखते हैं।’(यूहन्ना 1:12) यीशु मसीह को
अपने उद्धार कर्ता के में स्वीकर, विश्वास करना है। मनुष्य परमेश्वर के बात को
उल्लघण करके पाप में फँस गया है इसलिए उससे निभाने के लिये परमेश्वर के द्वारा
किया हुआ रास्ता के द्वारा ही वापस आ सकते हैं वह है यीशु मसीह।
यीशु मसीह पवित्रशास्त्र के वचन के
अनुसार हमारे पापों के लिये मर गया, और गाड़ा गया, और पवित्रशास्त्र के अनुसार
तीसरे दिन जी भी उठा, और परमेश्वरक संहासन के दहिने ओर जा बैठा है, एक दिन जिवितों
और मृतकों न्याय करने के लिये फिर से आएगा। यीशु के नाम पर विश्वास करने से
लेपालकपन आत्मा मिली है, जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं। हम ध्यान
से सोचना है कि हम कौन हैं? मेरा अपना पहचान क्या है? बाइबल के अनुसार जो लोग
यीशु मसीह में है उन लोगों का पहचान कुछ इस तरह का है। मैं यीशु मसीह के
जीवन के द्वारा खरिदा गया परमेश्वर के संतान है और पवित्र आत्मा के साथ चालने वाला
स्वर्ग राज्य के वारिस हूँ। यह
कितना अनोखि बात है हम परमेश्वर के संतान और यीशु मसीह के संगी वारिस का सहभागी
है। हम लोग किस और बात पर नहीं यही बात पर विश्वास करने वाला है। हमारे पहचान
संसार के किस लोगों के मुह के द्वारा निकाले वाला नहीं है। हमारे पहचान जीवित
परमेश्वर के वचनों से होता है, जो वचन, परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि के
समय में बोलता था।
दो पुत्रों के दुसरा समस्या यह है कि पिता के साथ सही
रिश्ता में नहीं रहे हैं।
अनुज पुत्र तो पिता जी से अपने
संपत्ति के हिस्सा को माँगकर चला गया है तो हम आसपास रूप से देख सकते हैं और जैठा
पुत्र भी पिता के घर में रहकर पिता के साथ सही रिश्ता में नहीं रहा। जब अपने भाई
की ओर पिता का भावना क्या है?
पिता का ध्यान किसकी ओर है? अदि के संबंध में कुछ भी जानकारी
नहीं था। सिर्फ अपने जगहों में रहकर अपना जीवन को व्यक्त करता रहा। न तो पिता से
रिश्ता जोड़ना, न तो खोये हुए अनुज भाई के साथ। इसकारण वह घर में रहकर भी पिता के
मन को नहीं जान सकता था। और जब पिता अपने छोटा भाई की प्रति अनुग्रह के भावना को दिखाने
लागे है तो क्रोध हुआ है। परमेश्वर हमारे
जीवन के द्वारा हम लोगों के साथ रिश्ता को मजबुत बनाना चाहते हैं और कोई नहीं।
इसलिये यीशु मसीह को हमारे लिये बलिदान देने भेजा गया है। और वह हम लोगों को फिर
से बाप बैठा के रिश्ता को पुननिर्मण कर दिया है। रिश्ता सिर्फ समय बित जाने से
मजबुत नहीं होता है। हम दुसरे से रिश्ता को बढ़ने की इच्छा रखते हुए एक दुसरे को
जाने के लिये प्रयास करना है। हम हमारे
परमेश्वर को परमेश्वर के वचनों के द्वारा जान सकते हैं और हमारे प्रार्थना के जीवन
के द्वार जान सकता है। पर रिश्ता को बढ़वा
सिर्फ जानकारी के साथ नहीं हो सकता है। जानकारी
के साथ हम लोग एक दुसरे को स्वीकार करना होगा। परमेश्वर ने तो हम लोगों को इस तरह
से स्वीकर किया है, ‘परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की
भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।’(रोम 5:8) हम लोगों भी परमेश्वर को अपने जीवन में
उत्तम स्थान देना होगा क्योंकि उसने मेरे जैसा अयोग्य व्यक्ति के लिये भी अपने
एकलौते पुत्र को दिया गया है। तो हम उसके पास आते है तो अपने संपुर्ण जीवन के साथ
आना होगा तो हमारे रिश्ता परमेश्वर के साथ आगे जा है।
प्रेरितों का विश्वास (APOSTLES' CREED HINDI)
प्रेरितों का
विश्वास
मैं विश्वास रखता हूँ
सर्वसामर्थी पिता परमेश्वर पर,
जिसने आकश व पृथ्वी की रचना की।
और उसके इकलौते पुत्र
हमारे प्रभु यीशु मसीह पर,
कि वह पवित्र आत्मा की
सामर्थ से देहधारी होकर कुंवारी मरियम से उत्पन्न हुआ,
पेन्तुस पिलातुस के
राज्य में दुःख उठाया, क्रूस पर चढ़ाया गया,
मारा गया, गाढ़ा गया,
अधोलोक में गया,
तीसरे दिन मृतकों में से
जी उठा,
आकाश पर चढ़ गया
और सर्वसामर्थी पिता
परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है।
जहाँ से वह जीवितों व
मृतकों का न्याय करन के लिए आएगा,
मैं विश्वास रखता हूँ
पवित्र आत्मा पर,
विश्वासियों की मण्डली
पर,
संतों की संगति पर,
पापों की क्षमा,
देह के जी उठने और अनंत
जीवन पर – आमीन।
Wednesday, 8 April 2015
ईस्टर
सप्ताह के पहिले दिन मरियम मगदलीनी
भोर को अंधेरा रहते ही कब्र पर आई, और पत्थर को कब्र से हटा हुआ देखा। तब वह दौड़ी
और शमौन पतरस और उस दूसरे चेले के पास जिस से यीशु प्रेम रखता था, आकर कहा,
“वे प्रभु को कब्र में से निकाल ले गए हैं,
और हम नहीं जानतीं, कि उसे कहाँ रख दिया है।”
तब पतरस
और वह दूसरा चेला निकलकर कब्र की ओर चले। वे दोनों साथ-साथ दौड़ रहे थे, परन्तु दूसरा चेला पतरस से आगे बढ़कर कब्र पर पहिले पहुंचा; और झुक कपड़े पड़े देखे, तौभी वह भीतर न गया। तब शमौन
पतरस उसके पीछे-पीछे पहुंचा, और कब्र के
भीतर गया और कपड़े पड़े देखे; और वह अंगोछा जो उसके सिर से बन्धा
हुआ था,
कपड़ों के साथ पड़ा हुआ नहीं, परन्तु अलग एक जगह लपेटा हुआ देखा।
तब दूसरा चेला भी जो कब्र पर पहिले पहुंचा था, भीतर गया और देखकर
विश्वास किया। वे तो अब तक पवित्रशास्त्र की वह बात न समझते थे, कि उसे मरे हुओं में से जी उठना होगा। तब ये चेले अपने घर लौट गए। परन्तु मरियम
रोती हुई कब्र के पास ही बाहर खड़ी रही, और रोते-रोते कब्र की ओर झुककर, दो स्वर्गदूतों को उज्जवल कपड़े
पहिने हुए एक को सिरहाने और दूसरे को पैताने बैठे देखा, जहाँ
यीशु का शिव रखा गया था। उन्हों ने उससे कहा,
“हे नारी, तू क्यों रोती
है?”
उस ने उन से कहा,
“वे मेरे प्रभु को उठा ले गए और मैं नहीं जानती
कि उसे कहाँ रखा है।”
यह कहकर
वह पीछे मुड़ी और यीशु को खड़े देखा पर न पहचाना कि यह यीशु है। यीशु ने उस से कहा,
“हे नारी तू क्यों रोती है? जिस को ढूंढ़ती है?”
उसने माली समझकर उससे कहा,
“हे महाराज, यदि तू ने उसे
उठा लिया है तो मुझ से कह कि उसे कहाँ रखा है, और मैं उसे ले जाऊँगी।”
यीशु ने उस से कहा,
“मरियम!”
उस ने
पीछे मुड़कर उससे इब्रानी में कहा,
“रब्बूनी!” अर्थात् ‘हे गुरू’।
यीशु ने उससे कहा,
“मुझे मत छू क्योंकि मैं अब तक पिता के पास ऊपर
नहीं गया, परन्तु मेरे भाइयों के पास जाकर उन से कह दे,
कि मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, और अपने
परमेश्वर,तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूं।”
मरियम मगदलीनी ने जाकर चेलों को बताया,
“मैंने प्रभु को देखा, और
उसने मुझ से ये बातें कहीं।”
उसी दिन जो सप्ताह का पहिला दिन था, सन्ध्या के समय जब वहाँ के द्वार
जहाँ चेले थे, यहूदियों के डर के मारे बन्द थे, तब यीशु आया और बीच में खड़ा होकर उन से कहा,
“तुम्हें शान्ति मिले।”
और यह कहकर उसने अपना हाथ और अपना पंजर उनको दिखाए।
तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए। यीशु ने फिर उनसे कहा, “तुम्हें शान्ति मिले; जैसे पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं भी तुम्हें भेजता
हूं।” यह कहकर उसने उन पर फूँका और उन से कहा,
“पवित्र आत्मा लो। जिन के पाप तुम क्षमा करो वे
उन के लिये क्षमा किए गए हैं जिन के तुम रखो, वे रखे गए हैं।”
परन्तु बारहों में से एक, अर्थात् थोमा जो दिदुमुस कहलाता है,
जब यीशु आया तो उनके साथ न था। जब अन्य चेले उससे कहने लगे,
“हम ने प्रभु को देखा है।”
तब उस ने उन से कहा,
“जब तक मैं उस के हाथों में कीलों के छेद न देख
लूं, और कीलों के छेदों में अपनी उंगली न डाल लूं, तब तक मैं विश्वास नहीं करूंगा।”
आठ दिन के बाद उस के चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उन के साथ था; और द्वार बन्द थे, तब यीशु ने आकर और बीच में खड़ा होकर
कहा,
“तुम्हें शान्ति मिले।”
तब उसने थोमा से कहा,
“अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी
नहीं परन्तु विश्वासी हो।”
यह सुन थोमा ने उत्तर दिया,
“हे मेरे प्रभु, हे मेरे
परमेश्वर!”
यीशु ने उस से कहा,
“तू ने तो मुझे देखकर विश्वास किया है,
धन्य हैं वे जिन्हों ने बिना देखे विश्वास किया।”
यीशु ने और भी बहुत चिन्ह चेलों के सामने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए।
परन्तु ये इसलिये लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।
(यूहन्ना 20:1-31)
यीशु मसीह
कब्र में से जी उठने के बाद अपने लोगों के पास अपने को प्रगट किया है और वे लेगों
को बताना चाहता था कि विश्वास करो, शांति मिलो और पवित्र आत्मा को पाओं।
1. विश्वास करो
यीशु मसीह चाहता था कि लोग अपने को देखकर विश्वास करें। इस
कारण यीशु मसीह जब लोगों के पास आता था तो वे लोगों को विश्वास में लाने के लिये
पवित्रशास्त्र से समझाता था, अपने दुःखभोग हुए शरिर को भी दिखा कर चेलों को
विश्वास में लाना चाहता था। क्योंकि विश्वास के द्वार हम यीशु मसीह के पुनरूत्थान
में शामिल होकर अनन्त जीवन पा सके।(यू्हान्ना11:25-26, 20:31)
2.
शांति मिले
यीशु मसीह अपने चले के पास प्रगट करता था। तो उस समय अधिकतर चेले लोग घबराहट
में थे क्योंकि वे लोग समझ नहीं पाते थे और परमेश्वर के महीमा से रहित थे। शांति
हम्हें तब मिलते हैं जब हम उच्चि जगहों में उपस्थित हो। शांति सुनसान जगह, खली
दिमग से नहीं मिल सकता है। जब तक उच्चि जगहों में नहीं जाता है तब तक नहीं मिलता
है। समझने के लिये जरा सोचिएँ हम लोग अधिकतक सुबह घर को छोड़कर अपने काम के लिये
निकालते हैं और काम करते करते थक जाते हैं और सोचते है कि कब घर वापस जा सकेगा।
समय पुरा होने के बाद अपने घर में वापस आते है तो क्षणभर के लिये शांति को महसूस
करता है क्योंकि हम लोग अपने उच्चित जगहो में आ गया है। तो मनुष्य के लिये
सर्वोत्तम उच्चित जगह कहा है? वह है परमेश्वर के पास। परमेश्वर ने मनुष्य को अपने साथ संगति
करने के लिये अपने आनन्द को भाँत ने के लिये सृजा गया है इसलिये मनुष्य परमेश्वर
के बिना शांति को नहीं पा सकते हैं। पापों के कारण परमेश्वर के महीमा से रहीत होने
के बाद से मनुष्य शांति की खोज में है। वह शांति को यीशु मसीह ने हम्हें देना
चाहते हैं। “मैं अपने पिता और तुम्हारे पिता, और अपने
परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूँ।” यीशु
मसीह हम लोगों को परमेश्वर से मिला कर हम्हें शांति को प्रदान करना चाहता है। “तुम्हें शांति मिले”
3.
पवित्र आत्मा लो
यीशु मसीह दुनिया में रहने के समय अपने लोगों को पवित्र आत्मा के बारे में
समझाने में अधिक बल दिया गया है। क्योंकि हम लोग पवित्र आत्मा के द्वारा यीशु मसीह
के जैसा जीवन जी सकता है और उसके अलावा हमारे पास दुसरा आशा है ही नहीं। जब यीशु
मसीह तिविरियास झील के किनारे में पतरस के साथ बात करने के समय यीशु के पास और
ज्यादा समय नहीं था, और वह अपने लोगों को, पतरस को साढ़े तीन साल के सेवा कार्य के
कल में सब कुछ दिखाया, सिखाया, समझाया, फिर भी उसके उत्तम चेले अपने पहचान को खो
कर मछली पा करने, अपने पुराने जीवन की ओर फिरा कर जीना शुरू हो गया है। ऐसा वक्त
में फिर से यीशु मसीह ने पतरस को उत्साह दे रहा है पवित्र आत्मा के आगमन पर भारोसा
रखकर, न पतरस के सुधार पर। हम यीशु मसीह के गवाह का जीवन जीना है। यह सिर्फ पवित्र
आत्मा के द्वारा ही हो सकता है। “जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया मे, और पृथ्वी की छोर तक मेरे
गवाह होगे।”
गुड फ्रईडे
उस ने उस आनेवाले
जगत को जिस की चर्चा हम कर रहे हैं,
स्वर्गदूतों के
आधीन न किया। वरन् किसी ने कहीं, यह गवाही दी है,
“मनुष्य क्या
हैं कि तू उस की सुधि लेता है?
या मनुष्य का पुत्र
क्या है, कि तू उस की चिन्ता करता है?
तू ने उसे स्वर्गदूतों
से कुछ ही कम किया;
तू ने उस पर महिमा
और आदर का मुकुट रखा,
और उसे अपने हाथों
के कामों पर अधिकार दिया।
तू ने सब कुछ उसके
पांवों के नीचे कर दिया।”
इसलिये जब कि उस
ने सब कुछ उसके आधीन कर दिया,
तो उस ने कुछ भी
रख न छोड़ा, जो उसके आधीन न हो।
पर हम अब तक सब
कुछ उसके आधीन नहीं देखते।
पर हम यीशु को
जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था,
मृत्यु का
दुःख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट
परिने हुए देखते हैं,
ताकि परमेश्वर
के अनुग्रह से वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे।
क्योंकि जिस के
लिये सब कुछ है, और जिस के द्वारा सब कुछ है,
उसे यही अच्छा
लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुंचाए,
तो उन के उद्धार
के कर्ता को दुख उठाने के द्वारा सिद्ध करे।
क्योंकि पवित्र
करनेवाला और जो पवित्र किए जाते हैं, सब एक ही
मूल से हैं;
इसी कारण वह उन्हें
भाई कहने से नहीं लजाता।
वह कहता है,
“मैं तेरा नाम
अपने भाइयों को सुनाऊंगा;
सभा के बीच में
मैं तेरा भजन गाऊंगा।”
और फिर यह,
“मैं उस पर
भरोसा रखूंगा।”
और फिर यह,
“देख,
मैं उन लड़कों सहित जिसे परमेश्वर ने मुझे दिए।”
इसलिये जब कि लड़के
मांस और लोहू के भागी हैं,
तो वह आप भी उन
के समान उन का सहभागी हो गया,
ताकि मृत्यु के
द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी,
अर्थात् शैतान
को निकम्मा कर दे।
और जितने मृत्यु
के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फँसे थे, उन्हें छुड़ा
ले।
क्योंकि वह तो
स्वर्गदूतों को नहीं बरन अब्राहम के वंश को संभालता है।
इस कारण उसको चाहिए
था,
कि सब बातों में
अपने भाइयों के समान बने;
जिस से वह उन बातों
में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं,
एक दयालु और विश्वासयोग्य
महायाजक बने
ताकि लोगों के
पापों के लिये प्रायश्चित करे।
क्योंकि जब उस
ने परीक्षा की दशा में दुख उठाया,
तो वह उन की भी
सहायता कर सकता है,
जिनकी परीक्षा
होती है।
(इब्रानियों2:5-18)
उपरोक्त पाठ
में हम देख सकते है कि यीशु मसीह के दुःख उठने से हम्हें निम्म बातों को हमारे
जीवन में अपना सकते हैं।
1 1. हम यीशु मसीह के भाई हो गया।(11)2. हमारे जीवन में शैतान निकम्मा हो गया।(14)3. हम मृत्यु के दासत्व से मुक्ति मिला।(15)4. हम्हें एक सहायक मिला(18)
यीशु मसीह यह काम को पुरा करने के लिये दो तरीके को
अपनाया है। वह हमारे सोचसे बिल्कुल अलग है। पहला यीशु मसीह मृत्यु का दुःख उठाने
का मार्ग लिया है। यह यीशु मसीह परमेश्वर के वचन के अनुसार, परमेश्वर के आज्ञाके
अनुसार हुआ है।(फिलि2:8) उन दिनों में क्रुस पर सिर्फ यीशु मसीह
ही नहीं मरा बल्कि बहुत सारे लोग क्रुस का साजा मिलकर अपने प्राण त्यागा है। पर
दोनो के बीच में यह अंतर है कि यीशु आज्ञाकारी होकर, अन्य लोगो आज्ञा को उल्लघन
करने से। इस कारण यीशु मसीह के नाम में शक्ति है, महीमा है। दूसरा यीशु मसीह अपने
भाइयों के समान बन कर यह काम को पुरा कर दिया है।(17) इसमें परमेश्वर के असिम
अनुग्रह को हम देख सकते हैं। परमेश्वर ने मनुष्य को अपने समानता में बनाया है। और
मनुष्य अपने पाप के चलते नष्ट हो गया है। उस दशा में भी यीशु हमारे समान बनकर अपना
प्रेम को प्रगट किया है। यह दो बाते मसीहियों के जीवन में बहुत महत्वपुर्ण
सिद्धांत है। क्योंकि यीशु मसीह इस मार्ग से हम्हें परमेश्वर से मिलवाया है। “क्योंकि मैं ने तुम्हें नमूना दिखा दिया कि जैसा मैं ने तुम्हारे साथ किया है, तुम भी वैसा ही किया करो।”(यूहन्ना 13:15) कितना अनोखा बात इस में है। प्रभु
ने हम को यह आज्ञा देते है इसका मतलब हमारे अंदर में इसको पुरा करने की क्षमता भी
है जो पवित्र आत्मा के द्वारा प्रदान होता है। हम पवित्र आत्मा के द्वारा यीशु मसीह
के समान जीवन जी सकते हैं। अगर हम यीशु मसीह के जैसा जीवन जीएँगे तो हमारे जीवन
आनन्द और आशा से परिपुर्ण हो जाते हैं। जब हम दुसरे के लिये सच्चा मन से सेवा करने
के लिये तैयारी हो जाता है तो खुशी होता है। यीशु मसीह भी बहुत से पुत्रों को
महिमा में पहँचाने के लिये दुःख उठाना अच्छा लगा है। मेरा दुःख उठाने से दूसरे लोग
आनन्द मिलता है और वही आनन्द मेरे जीवन को आगे की ओर ले जाता है। यीशु मसीह ने यह
सब बातों को परमेश्वर के वचन के अनुसार किया है जो वचन सृष्टि के तरिके थे। वचन के
अनुसार सब कुछ हुआ है। मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी तरह के आशा के साथ ही
जीते हैं। मनुष्य जीवन में सब से मुश्किल समय यह है जब आशाहिन के समय। इसलिये कभी
शिक्षा पर, कभी धन पर, कभी रिश्तेदारो पर लेकिन ज्यादातर यह संसारिक आशा हम्हें
धोखा देते हैं। पर हम परमेश्वर के वचन के अनुसार यीशु मसीह के जैसा जीना शुरू होगा
तो यह कभी हम को धोखा नहीं दे सकता है। यह आशा पुर्ण जीवन हमारे पास होना है यह
आशा को हम्हें देने के लिये यीशु मसीह दुःख उठाया है। यीशु के दुःख उठाने से सब से
उत्तम फल हम ही है। और यीशु मसीह हम्हें बताते हैं कि जाकर बहुत फल लाओं।
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