Tuesday, 5 February 2019

पहचान

उत्पत्ति 9


“फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृथ्वी में भर जाओ।”

परमेश्वर बार-बार पृथ्वी को भरने की बात करते हैं, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप और समानता में बनाया गया है। यदि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा और योजना के अनुसार एक-दूसरे से प्रेम करते हुए परमेश्वर से भी प्रेम करता, और पूरी पृथ्वी ऐसे लोगों से भर जाती, तो कितना सुंदर वातावरण होता!

आज भी परमेश्वर यही इच्छा रखते हैं कि पृथ्वी उन लोगों से भर जाए जो परमेश्वर को अपने जीवन का राजा मानते हैं। परमेश्वर आज भी अपने राज्य की प्रजा को खोज रहे हैं।

नूह ने खेती की और दाख की बारी लगाई। एक दिन उसने दाखमधु पिया और मतवाला होकर अपने तंबू के भीतर नंगा पड़ा रहा। उस समय उसके पुत्र हाम ने अपने पिता नूह की नग्नता को देखा और जाकर अपने भाइयों को बताया। लेकिन शेम और येपेत ने पीछे मुँह करके अपने पिता की नग्नता को कपड़े से ढाँप दिया।

हमारे जीवन में भी अक्सर दूसरों की कमजोरी देखने का अवसर आता है। गलती तो नूह की थी, लेकिन प्रश्न यह है कि उसके पुत्रों ने क्या किया?

जैसे शेम और येपेत ने अपने पिता की कमजोरी को ढाँप दिया, वैसे ही हमें भी दूसरों की कमजोरियों को ढाँपना चाहिए। बदला लेना, न्याय करना, और किसी को बदलना परमेश्वर का काम है।

हमें बहुत सावधानी से दूसरों की कमजोरियों को देखना चाहिए। हमारी पहचान किसी को नीचे गिराने से ऊँची नहीं होती। हमारी पहचान दूसरों से तुलना करने से नहीं मिलती। हमारी असली पहचान परमेश्वर के साथ संबंध में है। हमारी पहचान यीशु मसीह के बलिदान से है। हमारी पहचान यीशु के प्रेम को स्वीकार करने से है।

इसीलिए यीशु ने कहा:

“तू अपने भाई की आँख के तिनके को क्यों देखता है, और अपनी ही आँख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता? जब तू अपनी ही आँख का लट्ठा नहीं देखता, तो अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘हे भाई; ठहर जा तेरी आँख से तिनके को निकाल दूँ’? हे कपटी, पहले अपनी आँख से लट्ठा निकाल, तब जो तिनका तेरे भाई की आँख में है, उसे भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।”(लूका 6:41-42)

यीशु मसीह की शिक्षा हमेशा यही है कि पहले अपने ऊपर ध्यान दो।

हम अपने आप को भी पूरी तरह संभाल नहीं सकते। हम अपने निर्णयों और प्रयासों से अपने जीवन में परिवर्तन लाना चाहते हैं, फिर भी सच्चा परिवर्तन नहीं ला पाते। फिर हम दूसरों के जीवन को कैसे बदल सकते हैं?

जब तक पवित्र आत्मा मनुष्य के जीवन में कार्य नहीं करेगा, तब तक वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है।

इसलिए हमें अपने आप को पवित्र आत्मा के हाथों में सौंप देना चाहिए। दूसरों को सुधारने से पहले हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हमारा अपना जीवन परमेश्वर के अधीन हो।


प्रभु!

हमें ऐसा जीवन दीजिए जो दूसरों की कमजोरियों पर दृष्टि न रखे, बल्कि केवल यीशु मसीह की ओर देखे, ताकि हम अपनी असली पहचान को समझ सकें।


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